मैं दलित हूँ आपकी गाय नहीं
मैं दलित हूँ और आपके दमन का वो इतिहास हूँ जो आपके मानव अथवा सभ्य होने पर बार बार प्रश्न खड़ा करता है. मैं आपकी सभ्यता पर वो सवाल हूँ जिसका आपके पास कोई जबाब नहीं है. आज भी आपमें इतिहास की तरफ़ झाँकने की हिम्मत नहीं है. अगर आप उस दमन के इतिहास को सही मानते हैं तो आपसे मुझे कोई शिकायत नहीं है. तो मैं खुश हूँ, आपकी झूठी सभ्यता का ढोंग देखकर. मैं आपको उस इतिहास में ले जा रहा हूँ जहाँ आपने मुझे मानव भी नहीं समझा, मेरे अस्तित्व को भी नहीं माना. मुझे छूना भी दुस्वार समझा, आपको मेरी परछाई भी गवारा नहीं थी. आपने, अपने को देवता कहा और मैंने मान लिया, वो भी बिना किसी सवाल किये. वो मेरी निष्ठा थी और मेरी निष्ठा को आपने मेरी मुर्खता समझा. इतिहास गवाह है कि मैं उस समय भी “एकलव्य” था, मैं “कर्ण” था, मैं “शम्बूक” था, मैं उस समय भी “बरबरी” था. आप डर गए थे मुझसे और आपने मेरा अंगूठा, मेरा कवच, मेरा जीवन, सब ले लिया था और मैंने उफ़ तक नहीं किया था. मैं आपके इस समाज की वो जरूरत था जिसके बिना आप अपनी सभ्यता का झूठा ढोंग नहीं रच पाते. मैं था, इसिलए आप सभ्य थे अन्यथा आप कचड़े का ढेर होते, आप सड़ रहे होते, आप...