जेएनयु तुम्हारा ‘दीया’ जलते रह्ने से ही मानवता जिंदा रहेगी

 जेएनयु मै जा रहा हूँ तुम्हे छोड्कर नही बल्कि तुम्हे अपने साथ लेकर. तुमसे विदा लेने का समय आ गया है. ऐसा लग रहा है मानो अभी तो आये ही थे और अब जाना है. ऐसा ही है जेएनयु, आप आते तो हैं पर आप यहाँ से जा नहीं पाते, और सही भी है, क्युंकि मानवीय मूल्यो से भला कौन दूर जा पाता है. मै जब सीनीयर्स को अपने बच्चो को लेकर जेएनयु आते देखता था, तो सवाल होते थे मन मे, कि ऐसा क्या है यहाँ पर जो इतने सालो बाद भी लोग यहाँ आते हैं. मेरे कमरे भी आये थे, सत्तर के दशक के एक छात्र, अपने पूरे परिवार के साथ, अजीब सी खुशी देखी थी उनके चेहरे पर, मानो सालो बाद आप अपने आप से मिल रहे हो. जब आज जा रहा हूँ तो बस ऐसा ही कुछ ऐह्सास है. जेएनयु तुम दिल मे हो. तुम्हरा दिया हुआ “दीपक/दीया” जो कि तुम्हारे ‘लोगो’ में भी है, साथ लेकर जा रहा हूँ. उस “दीये” के प्रकाश से ही तो इस दुनिया को प्रकाशित करना है.

जब आया तो बस एक शरीर मात्र था, इसमे आत्मा तो तुम्ही ने डाला है. एक छोटे से ग़ॉव का शरीर था मै, तुमने मुझे इंसान बनाया. तुमने बताया कि, मै किसी जाति, धर्म, सम्प्रदाय, लिंग या छेत्र का नही बल्कि इंसान हूँ. पहली बार मै सबके बराबर हुआ था और सब मेरे बराबर हुए थे. कुछ दिनो तक मैं विश्वास नही कर पाया था. तुम्ही ने तोडा था सारे अवैग्यनीक सिद्धांतो को, मै धीरे-धीरे वैग्यनिक सोच वाला मानव बन रहा था. तुम ना होते तो, मै महज शरीर रह जाता, सम्वेद्नाओ से परे, महज एक शरीर.

जब आया तो मर्द था, तुमने मर्द से इंसान बनने कि राह दिखायी. तुमने बताया कि औरत के शरीर को छुने से करेंट नही लगता बल्कि मानवीय एहसास होता है. उसके माह्वारी को जानकर उसके स्रिजन करने कि छमता पर मुझे गर्व हुआ था. तुम ना होते तो, मै भी उसे बस कुछ रिश्तो मे ही बांध लेता. तुम्ही ने औरत के दर्द को मह्सूस करना सीखाया. तुम्ही ने इस चेतावनी को याद रखने कहा कि अब किसी भी सभ्यता का अंत औरतो कि जली, सड़ी-गली लाश से ना होने पाए. अब मुझे औरत को देखकर उसके होने का एहसास होता है.

जब आया तो एक धर्म का अनुयायी था, तुमने मानवता का अनुयायी बनाया. अब मुझे अपने धर्म का एह्सास हुआ था. मै उस तमाम धर्मो के जंजाल से मुक्त हुआ था जिसमे हमने सिर्फ अपना जीवन नही खोया था बल्की पूरी मानवता दम तोड चुकी थी. अब समझ मे आ गया था कि लोगो के दुख का कारण, धर्मो के अंदर रहने कि वजह से है. वो कैसा धर्म होगा जिसमे दुख का कारण भी भगवान ही होता हो. वो कैसा धर्म होगा जिसे स्थापित होने के लिये भी अधर्म के रास्ते की ही जरूरत पड्ती हो. तुमने मुझे उद्देश्य के लिये सही रास्ता चुनने को ज्यादा जरूरी बताया.

जब आया तो अशृप्यता को खतरनाक मानता था लेकिन जेएनयु ने सिर्फ अशृप्यता को ही नहीं बल्कि अद्रिश्यता को भी समझ मे लाने को कहा. अद्रिश्यता कितना भयंकर है कि जो हम देखकर भी अनदेखा कर देते हैं. जो अद्रिश्य है वो भी देखना कितना जरूरी हो जाता है. यहाँ आकर पता चला कि जो कुछ् हम देख नही पाते वो सब सही नही हो रहा होता. अद्रिश्यता तो किसी के होने तक का एहसास नही होने देता. सब तरफ तरक्की के दौर में तुमने मुझे गरीबी और लाचारी का वो द्रिश्य भी देखने को कहा जो इस तरक्की की चका-चौंध मे अद्रिश्य हो गया है. पह्ले हमने अशृप्यता को झेला और अब अद्रिश्यता झेल रहे हैं.

जब आया तो देश की संक्ल्पना बस भुखंड मात्र था लेकिन अब ऐसा नही है. अब देश, जमीन का टुकड़ा भर नही बल्की जीव-निर्जीव का समूह है. भारत विश्व के नक्शे पर एक भु-खंड हो सकता है लेकिन भारतवर्ष तो वैश्विक है. हम जमीन के टुकड़े के लिये कभी नही लड़े लेकिन मानवता के लिये न्योछावर हुए हैं. कोइ भुखंड हमारा रहे या ना रहे परंतु वहा के लोग हमारे ही रहेंगे. अब मुझे सिर्फ भुखंड नही चाहिये बल्कि लोग भी चाहिये. तभी तो इतनी विविधताओ के वावजूद भारत एक है. हमारे लिये भारत जमीन का टुकड़ा नही बल्कि हमारे लोग हैं. काश! दुनिया ये समझ पाती तो शायद, भू-भाग कि लड़ायी मे हमारे ही लोगो के खून से ये धरा लाल ना हुयी होती.

मै तो बस डीग्री लेने आया था लेकिन तुमने मुझे सिर्फ डीग्री नही दी बल्कि प्रकाश मे फैले हुए अंधकार को देखना सीखाया. तुमने नकारत्म्क सोच से दूर रहना सिखाया और एक सकारात्म्क समाज के निर्माण कि प्रेरणा दी. तुमने मेरे परिवार का दाय्ररा बढाया, अब मेरा परिवार मुझे छोटा नही लगता बल्कि बहुत बड़ा सा लगता है. अब हर इंसान खूबसूरत लगता है, हम सब अलग-अलग होते हुए भी एक ही हैं. जो समाज हमे बराबर ना समझे, उस समाज को हमे बद्ल देना चाहिये. कितना जरूरी था ये समझना कि सड़्के सभ्य होने मात्र से हम सभ्य नही हो जाते बल्कि समाज को सभ्य होना पड़्ता है. हमारे लिये सफलता कितना जरूरी था लेकिन तुमने कहा कि सफलता आदर्श नहीं बल्कि संघर्ष आदर्श होना चाहिये. संघर्ष करो “आदर्श समाज” के लिये.

मै आया तो कितना बिखरा हुआ थाअब समेटा हुआ सा महसुस करता हूँ. तुमने मुझे अंत-अंत तक सीखने पर बल देने को कहा, कितना जरूरी था ये समझना कि हमे सब से सीखना चाहिये और अंत-अंत तक सीखना चाहिये. मै तुम्हारा “दीया” लेकर उस अंधकार और अंधविश्वास से भरे समाज में जा रहा हूँ, जहाँ हर व्यक्ति बस शरीर है, समवेद्न-विहीन, कुत्सित, कुंठीत, अद्रिश्यता से भरा समाज, बस नाम का समाज. उन्हे बदलने, उन्हे समझाने कि कुंठित समाज सम्यक समाज नही कहलाता बल्कि एक समय के बाद, अपने ही अंतर्विरोध मे खत्म हो जाता है. जेएनयु तुम ऐसे ही रहना, तुम डरना मत क्युंकि तुम्हारा एक “दीया” भी अगर जल रहा है तो समझो कि तुम विश्वविद्यालय के बतौर काम कर रहे हो. तुम सच्चे अर्थ मे विश्वविद्यालय हो, तुम मानवता का प्रितिबिम्ब हो. मै जहॉ भी रहू, तुम साथ रहोगे, तुम्हरा दिया हुआ “दीया” जलता रहेगा.

Deepak Bhaskar

July 24 2016

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