दहेज़ लेने वाले लड़के फायदे में नहीं बल्कि नुकसान में हैं (दहेज़ डायरी से पार्ट फोर)

 मैं उससे, शादी नहीं करना चाहती हूँ. उसे दहेज़ लेना है, सामाजिक समझौता करना है, पर मुझे तो शादी करनी हैं, मेरे सपनों को साकार करने वाले से नहीं बल्कि मुझे, मेरे सपनों को साकार करने देने वाले से. कुछ दिन पहले पटना में एक लड़केवाले मुझे देखने आये थे. उन्होंने पूछा कि खाना बनाना आता है? मैं झूठ नहीं बोल पायी. उन्होंने मेरे घर वालों को खूब सुना दिया कि आपलोगों ने लड़की को खाना बनाना तक नहीं सिखाया. उन्होंने पटना खाना बनाने सीखने नहीं बल्कि पटना साइंस कॉलेज के केमिस्ट्री लैब में केमिकल रिएक्शन करने भेजा था. कभी-कभार लैब में, मैं इनलोगों के दिमाग को ठीक करने का केमिकल बनाने का प्रयास करती रहती हूँ. माँ ने दूसरा लड़का भी जल्द ही ढूँढ लिया. लड़का बीपीएससी से माइनर इरीगेशन डिपार्टमेंट में तीस हजार महीने वेतन पाने वाला असिस्टेंट एन्जिनीर है. उसका वजन भी महज तीस किलो ही है और दहेज़ की मांग तीस लाख है, साथ में एक भरी सोना, कपडा-लत्ता, जूता-मौजा, टोर्च-छाता, ब्रश-जिभिया-टूथपेस्ट, सेविंग किट, तेल-साबुन-सेंट, रुमाल-गमछा, चड्डी-बनियान, घड़ी-चश्मा, अंगूठी-चेन इत्यादि अलग से. क्या वो ये सब भी नहीं खरीद सकता? मुझसे मिलने आया, मेरा ऐसा इंटरव्यू कभी किसी परीक्षा के बोर्ड ने भी नहीं लिया. सेलक्सन बोर्ड को इनसे ट्रेनिंग लेनी चाहिए. मुझ पर सवालों की बारिश शुरू हुई. एनर्ट गैस कितने हैं? पेरियोडिक टेबल, किस वैज्ञानिक ने दिया है? ऑक्सीडेशन और रिडक्शन की परिभाषा बताइए? आइसोटोप और आइसोबार में क्या अंतर होता है? माँ बगल में परेशान बैठी थी, इस बार वो मुझे अकेला छोड़कर कोई रिस्क नहीं लेना चाहती थी. मैं जबाब दिए जा रही थी. मुझे ऐसा लग रहा था की मेरी शादी नहीं बल्कि लैब असिस्टेंट की नौकरी लगने वाली है. सिलसिला नहीं थमा, बिहारी गणित पूछे बिना कैसे बाज आता तो, (a+b+c) का क्यूब का फार्मूला बताइए? स्पीकर का नाम बताइए? मैंने पूछ लिया किसका, लोक सभा या विधान सभा. माँ ने डाँटते हुए कहा, जो पूछ रहे हैं उसका जबाब दो. अमेरिका का प्रेसिडेंट कौन है और किस पार्टी से है? इससे पहले वाला कौन था और किस पार्टी से था? ऐसा लग रहा था कि मुझे अब रेलवे, एसएससी जैसे परीक्षा के लिए टेस्ट सीरीज करने कोई जरुरत नहीं थी. अपना बायो-डाटा इंग्लिश और हिंदी दोनों में लिखिए? इंडिया के बारे में दस लाइन लिखिए? अच्छा! भोकेब्लरी बहुत जरुरी चीज है. मुण्डकोपनिषद को हिंदी में और सुपरस्टीसन को अंगेरजी में लिखिए? सहसा, स्कूल वाली वंदना मैडम याद आ गयी. आपका क्या एम्बिशन हैं? हम बिहार में हैं, वैसे वेतन के साथ, थोडा बहुत ऊपर से आ ही जाता है तो आपको नौकरी करने की जरुरत नहीं पड़ेगी. उसे, मैं कैसे बताती कि मेरे लिए नौकरी घर चलाने भर की बात नहीं बल्कि आत्म-सम्मान का सवाल है. फिर भी अगर आपकी नौकरी बाहर लग गयी तो जॉब छोड़ सकती हैं? खड़ा होइए, चल के दिखाइए, हील वाला चप्पल खोलिए, नार्मल स्लीपर पहनिए. इतना कैट-वाक अगर मैं मार्क रोबिनसन के सामने करती तो शायद मॉडल होती. हॉबी क्या-क्या है? खाना बनाने आता है? माँ कूद कर बोली ये सब-कुछ इसी ने बनाया है. अंतिम सवाल! अपने आराध्य भगवान् का नाम लिखिए और जाइये. मैंने झट से “बुद्ध” का नाम लिखा और चल दिया. रुकिए! क्या आप हिन्दू धर्म में विश्वास नहीं करती? माँ ने बस संभाल लिया. मुझे खुद पर घिन्न आ रहा था. आपका दहेज़ पर लेख, यूथ की आवाज में पढ़ा था इसलिए आपको बता रही हूँ. मैं पटना के मंदिर, मजार पर मन्नत भी मांगती हूँ की मेरी शादी ऐसे लोगों से ना हो, क्यूंकि मैं शादी करके खुश नहीं रह पाउंगी.

सोचिये! हम कैसे लड़के हो गए हैं. दहेज़ के लिए, हम लड़के ऐसी लड़की से शादी कर रहे हैं जिसके दिल में हम शायद, कभी जगह नहीं बना पायें. महज कुछ रुपयों के लिए हम अपनी प्रेमिका को भी, पिता जी और समाज के लिए ठुकरा देते हैं और जिन्दगी भर उसके दिए हुए टेडी बियर को निहारते रहते हैं. प्रेमिका की शादी में जाकर मंडप सजाते हैं, बाराती का स्वागत-सत्कार करते हैं. मेले में, प्रेमिका अपने बच्चे से हमें मामा कहलवाने से बाज नहीं आती, वो भी एक प्रकार से तंज कस रही होती है. कियो-कारपिन का तेल खरीदकर देती है और कहती है इसे पत्नी को केश में लगाने को कहना, तुम्हे इसकी खुशबू बहुत पसंद थी. हम सब कुछ हार गए होते हैं. हम कैसे ये हार स्वीकार कर लेते हैं जबकि हमने हार के बदले, मृत्यु को स्वीकारना की कसम खाई थी. हम हारे हुए लोगों से बना, पराजित समाज कितने दिन जीवित रह पायेगा.

हमें सीखना चाहिए, मध्य प्रदेश के नारमदी समुदाय से जहाँ दहेज़ लेना कलंकित है. शायद इसीलिए उत्तर प्रदेश के लोग मध्य-प्रदेश में अपनी बेटी तो ब्याहते हैं लेकिन बेटे की शादी वहां नहीं करते. भील आदिवासी समुदाय जो अपने लड़के को शादी से पहले स्वतंत्र कर देता है ताकि वो अपनी जिंदगी की शुरुआत अपने दम पर कर सके. हम दहेज़ लेकर लड़की से ज्यादा खुद का नुक्सान करते हैं. अपनी पत्नी के दिल का राजकुमार नहीं बल्कि शरीर का सौदागर हो जाते हैं. अब वो अपने पिता का दर्द भी महसूस नहीं करती, एक बहु और पतिवर्ता औरत है. वह आत्मा से परे, कितना शरीर हो गयी है. इस आत्माविहीन मृत शरीर को छूने से डरना चाहिए. हमें रुकना चाहिए. नहीं रुके तो डाकू से बौद्ध भिक्षु बना अन्गुलिमान भी हम पर हंसेगा. हम कैसे इसे रोकें? दहेज़ डायरी के अंतिम पार्ट द कन्क्लूजन में.

(इस लेख का मुख्य अंश, बिहार की पाठक द्वारा भेजे गए मेल पर आधारित है. लेखक, उनका आभार के साथ, उनके उज्जवल भविष्य की कामना करता है)

डॉ दीपक भास्कर, दिल्ली विश्विद्यालय के दौलत राम कॉलेज में राजनीति पढ़ाते हैं.

May 24 2017

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