क्यूँ टॉपर होना इतना जरूरी था रूबी के लिए?
रूबी राय बिहार इंटरमीडिएट परीक्षा २०१६ की टॉपर, फ़र्ज़ी टॉपर होने के आरोप में जेल में बंद कर दी गयी. सवाल ये नहीं की उसने गलत किया की नहीं. वो तो अभी १८ साल की भी नहीं हुई है, उसे गलत और सही के पचड़े में क्यूँ फ़साना. असल मुद्दा तो टॉपर बनने की ख्वाहिश का है. रूबी बिहार में सबसे ज्यादा टॉपर देने वाले प्राइवेट कॉलेज VK राय कॉलेज की छात्र थी. इस कॉलेज ने लगभग हर साल टॉपर ही दिए हैं, ऐसे और भी कॉलेज हैं राज्य में जिनके रिजल्ट अचंभित करने वाले होते हैं. बिहार का हर वह छात्र जो कोटा में जाकर इंजीनियरिंग, मेडिकल की तैयारी करना चाहते है, प्रायः ऐसे कॉलेज में एडमिशन लेता है. जब रूबी का मामला मीडिया में आया तो हंगामा मच गया. ऐसा लगा मानो पहली बार ऐसा हुआ हो. लेकिन जो आप देख नहीं पाते वो सब सही तो नहीं हो रहा होता है न. समस्या ये नहीं की रूबी गलत तरीके से टॉप की, समस्या यह है की रूबी टॉप क्यों करना चाहती है. मैं समस्याओं के कारण ढूढ़ने में ज्यादा रूचि रखता हूँ. तो रूबी टॉपर कांड में दोषी कौन है? रूबी की गिरफ्तारी तो होनी ही थी. सबसे सरल है किसी ऐसे को गिरफ्तार कर जेल में डाल देना और फिर सब कुछ नार्मल जैसा दिखाना और फिर आगे बढ़ जाना. क्यों पिछले बार भी हुआ था….पूरी दुनिया ने देखा था हम सबको खिड़कियों पर लटके हुए, फिर क्या हुआ. वो उस साल की न्यूज़ थी ये इस साल की खबर है. रूबी को गिरफ्तार कर पटना पुलिस अपना काम कर दिया और किसको गिरफ्तार करते आप? क्या आप उन तमाम मुखिया, सरपंच, मंत्री, शिक्षा मंत्री, विधायक, सांसद, मुख्यमंत्री को करते? जिन्होंने सरकारी स्कूलों में ‘शिक्षा मित्रों‘ को तमाम तरह के प्रपंचों को अपनाकर नियुक्त किया था. क्या “शिक्षा मित्रों” के अवैध नियुक्ति पर हमने कुछ कहा था? उसमे हम सब थे क्यूंकि हमारा भाई था, बहन थी, दोस्त थे, सगे सम्बन्धी थे, हम क्यूँ बोलते? तो क्या तब हम समाज को ख़राब नहीं कर रहे थे? आप लाख तर्क दे दें लेकिन उससे होगा क्या. हमने बस समाज बनकर सबको दोष देते रहे, कभी हमने अपने गिरेबां में नहीं देखा. हम समाज हैं और हम किसी भी घटना के लिए दोषी कहाँ होते हैं. आप रूबी राय पर हंस रहे हैं लेकिन आप सोचिये की अगर वो पोलिटिकल साइंस का सही उच्चारण भी कर लेती, या फिर वो ये भी बता देती की इसमें राजनीती की पढाई होती है तो क्या आप मान लेते की उसको पोलिटिकल साइंस आता है. आप उन शिक्षा मित्रों से भी पूछिए, उनका भी इंटरव्यू लीजिए की पोलिटिकल साइंस में कितने पेपर पढ़ने होते हैं और क्या पढ़ना होता है तब आपको रूबी की असली कहानी पता चलेगी. प्लेटो, होब्स, रॉल्स, ऑस्टिन, पार्था चटर्जी और अकील बिलग्रामी की बात तो करियेगा भी नहीं. हम जैसे समाज है, हमारी सरकारें भी तो वैसा करेंगी. बिहार की ‘शिक्षा निति‘ के कारण, जो दक्ष थे वो बिहार में ट्यूशन पढ़ाते हैं और सरकार शिक्षा मित्रों की नियुक्ति के बाद दक्षता परीक्षा लेती है. उस समय आप “समाज” ने क्यूँ विरोध नहीं किया था? क्यूँ हमारे चुने विधायकों ने चुप्पी साध ली थी? इतना ही क्यूँ जिस दिन फोकनिया बोर्ड (जो की बिहार मदरसा बोर्ड के द्वारा चलता है) का मामला खुलेगा आपकी आँखे आँख से बाहर निकल आएगी. साहब! ‘अल्लाह‘ भी ठीक से जो लिख नहीं पाते उसे वहां ९०% नंबर आता हैं. बिहार में शिक्षक बनने के लिए ये जरूरी अंक था. मध्यमा बोर्ड का भी हाल वैसा ही हैं. अब उसका क्या करेंगे. जब सब कुछ चुनाव जितने के लिए ही करना हो तो फिर आप ऐसे ही व्यवस्था बना पाते हैं. केंद्र से लेकर राज्यों तक, हर पार्टी को बस चुनाव जितना है. पार्टियां भी क्या करें, आप भी तो ऐसा ही कुछ चाहते हैं. बिहार में छात्र कॉलेज में कम मिलते हैं और प्रखंड ब्लॉक में ज्यादा. हमने क्यूँ नहीं रोका इन्हे, क्यूँ नहीं कहा की कॉलेज जाओ, तुम गलत तरीके से पैसे मत कमाओ. जो मुखिया गरीब था जब वो जीतने के बाद चार अलग अलग रंग का स्कार्पियो ख़रीदा तो हमने क्यूँ नहीं विरोध किया? क्या हम नहीं जानते थे की ये सब काले कारनामे का नतीजा है. सत्ता वर्ग तो ऐसा होता ही है, लेकिन हमने विरोध की सत्ता को क्यूँ छोड़ दी. असल में जेल रूबी को नहीं, हम सबको, मतलब इस समाज को जाना चाहिए.क्या रूबी बनना चाहती थी टॉपर? किसको चाहिए था ये टॉपर? निस्संदेह हमें/ समाज को चाहिए था. क्यूँ चाहिए था आपको टॉपर? क्यूंकि.वो टॉप करती तभी तो उसे नौकरी मिलती…… तभी तो उसको समाज में इज्जत मिलती……. तभी तो आप चौक चौराहे और दुसरे गावं में अपने मूछे तरेरते…….तभी तो उसकी शादी अच्छे जगह होती……. तभी तो उसका गेहुआं या काला रंग ज्यादा मायने नहीं रखता…. तभी तो उसके मोठे होंठ भी आपको सुन्दर लगते…..तभी तो आप शायद उसे अंडे देने वाली मुर्गी समझकर थोड़ा कम “दहेज़” लेते…..तभी तो शायद आप उसे जला नहीं देते गैस सिलिंडर फटने वाले कांड में….तभी रूबी को आप सब मिलकर डायन नहीं कहते.सोचिये क्यूँ किसी को टॉप करना पड़ता है, क्यूँ किसी को नौकरी के लिए क्या कुछ नहीं करना पड़ता है, पैसे देकर भी सरकारी नौकरी लेना कितना जरूरी हो जाता है क्यूंकि सरकारी नौकरी नहीं हो तो हम उसे समाज में जगह ही नहीं देते, आज लाखों छात्र सेवादार की नौकरी के लिए आवेदन कर रहे है, कभी हमने सोचा की हम क्या कर रहे हैं. सरकारी नौकरी की चाह रूबी या और किसी को नहीं बल्कि समाज को है. क्या हमने कभी किसी मेहनत करने वाले छात्र (जिसे किसी कारणवश कम अंक आया हो) का हौंसला बढ़ाया. हमने सिर्फ सफलता की पूजा की, उसे आदर्श माना, उसका मीडिया ने इंटरव्यू लिया. असफलता तो कलंकित है, कभी उसे हमने नहीं सराहा की कोई नहीं जिंदगी में बहुत अवसर आते हैं. हम समाज है सफलताओं की, तो उसमे रूबी टॉपर बनने के लिए कुछ भी करेगी और वो सही भी है.क्यूंकि हम चाहते है की वो टॉप करे…रूबी दोषी नहीं, सरकार को तो मैं क्यां दोष दूँ..दोषी हम हैं…और हम समाज हैं…हम दोष उसके ऊपर मढ दे वो अलग बात है….लेकिन दोष स्थांतरित तो हो नहीं सकता….अगर रूबी को हमने जीने नहीं दिया तो हम कातिल समाज होंगे.रूबी तुमसे कह रहा हूँ की तुम चिंता मत करना…..तुम जीना इस समाज के सामने खड़ा रहना. तुमने तो पापा से कहा भी था की तुम्हे सिर्फ पास करना था लेकिन पापा तो समाज में रहते हैं न उनको अपनी इज्जत भी तो बढ़ानी थी……तुम दोषी नहीं हो…..बल्कि उस व्यवस्था में जो लोग हैं उनसे कहीं ज्यादा पोलिटिकल साइंस आता है तुम्हे…..कम से कम तुम्हे ये पता था की तुमने कौन सा विषय रखा है….कितने पास किये छात्र को ये भी नहीं पता होगा. तुम्हे भी तो IAS ही बनना था….तुम शायद न भी चाहती होगी लेकिन नौकरियां भी तो दो ही तरह की हैं….IAS और Non-IAS . कोई क्या कर सकता है.. हम वो समाज है रूबी, जो तुम्हे जिन्दा जलाते है, तुम्हारे शरीर को छलनी करते हैं, दहेज़ न देने पर बरात वापस ले जाते है, खाने में नमक कम होने पर तुम पर लाठियां भांजते है, हम तुम्हारे छोटे कपडे पहनने पर बदचलन कहते हैं, हम वो समाज हैं रूबी, जो तुम्हारे ठहाके वाली हसीं को बेहयापन कहते है, हम तुम्हारे माहवारी को कलंक मानते है, तुम्हारे विधवा होने को शाप मानते है….तुम हमारे लिए मत सोचो…हमने तुम्हे कभी इज्जत नहीं दी. तुम निराश मत हो, हसों हम पर, इस समाज पर, जिसने तुम्हे टॉप करने के लिए मजबूर किया……बोलो इनसे की, दहेज़ के लिए लड़कियां जलाने वाले तुम मुझे क्या कोसोगे. कहना इनसे की तुम्हारे वाले जेल से बेहतर ये जेल है..तुम जेल नहीं गयी हो रूबी….ये टॉपर की लालसा वाला समाज जेल गया है….ये व्यवस्था जेल गयी है. तुमने बिना पोलिटिकल साइंस पढ़े सब कुछ पढ़ लिया होगा अब तक…...रूबी अगर तुम्हे पोलिटिकल साइंस आता भी तो किसी एक छोटी सी गलती पर हम ये कहने से नहीं चूकते की तुम एक “लड़की” हो….रूबी तुम दोषी हो, जेल में हो… इसी से हम दोष मुक्त हो जाते हैं.
Deepak Bhaskar
July 1 2016
Comments
Post a Comment