बिहार में शहाबुद्दीन को जमानत नहीं बल्कि “न्याय” की जमानत जब्त हुई है.

 बिहार में ग्यारह साल पहले बाहुबली शहाबुद्दीन को अनगिनत अपराध के लिए पुलिस कार्यवाई में जेल हुई थी. इन अपराधों की फेहरिस्त इतनी लम्बी है की उसे यहाँ लिखने से, शायद और कुछ भी लिखने की जगह नहीं बचेगी. बस, इसे इस तरह समझा जाना चाहिए कि, शहाबुद्दीन से कोई भी जघन्य अपराध नहीं बचे हुए हैं. चाहे वह हत्या हो, रेप हो अथवा पकिस्तान के आईएसआई से सम्बन्ध. यह वो बाहुबली है जिससे लालू यादव भी खुद डर गए थे. ऐसे ही बाहुबलियों को लालू यादव की सरकार में संरक्षण की होने की वजह से, पटना उच्च न्यायलय ने बिहार में लालू के राज को “जंगल-राज” की संज्ञा दी थी. सिवान जिले से ताल्लुक रखने वाले शहाबुद्दीन, “डर” का वो नाम है, जिसे “शोले” फिल्म के ‘गब्बर’ ने भी ठीक से चरितार्थ नहीं किया था. अब वो जेल से रिहा हो गया है और बिहार में बाहुबली के साथ रहने की मानसिकता, सरकार के साथ रहने से ज्यादा महत्वपूर्ण है. इसलिए बाहुबली को १५०० गाड़ियों का काफिला भागलपूर जेल से सिवान तक ले गया, वो भी बिना किसी टोल टैक्स को दिए हुए. पठाखे फोड़ने से मना करने पर लोगों को बेरहमी से पीट भी दिया गया. जनता के मन में शहाबुद्दीन का वो डर है की अगर उनसे कोई सवाल पूछा जाये तो जवाब आता है की बाहुबली उनके लिए भगवान् हैं. जिन्दा  रहने के लिए, इनको भगवान् मानना भी तो जरूरी है. वैसे अब भगवान् भी तो श्रधा की वजह से नहीं बल्कि डर की वजह से हीं अस्तित्व में हैं. सोशल मीडिया में तरह-तरह की बातें हो रहीं है. कुछ लोग ये कहकर उसे बचा रहे हैं की, इनसे ज्यादा बड़े अपराधी दूसरी पार्टी में हैं या फिर इतने लोगों को जमानत मिली है तो इसे क्यूँ नहीं? अब हमारा तर्क भी तो, किसी और के उदहारण से ही गढ़े जा रहे हैं. बीजेपी वालों से पूछिए तो वो कांग्रेस सरकार का बहाना लेते हैं कि आप कांग्रेस सरकार से सवाल क्यूँ नहीं पूछते थे. अब उन्हें कौन ये बताये की कांग्रेस के लिए थोडा भी प्यार होता तो बीजेपी सरकार में कैसे होती? लालू यादव से पूछिए तो वो बीजेपी के साम्प्रदायिक होने का ढोल पिट देते हैं और फिर कितने जरूरी सवालों की हत्या हो जाती है. सवालों की हत्या हीं तो जनतंत्र की हत्या है. ऐसे ही हत्यारे हर तरफ़ बैठे हुए नजर आते हैं. हमारे सवालों की हत्या हीं हमारी हत्या करने जैसा है. सोशल मीडिया पर, शाहबुद्दीन के मुसलमान होने की वजह से, उसे परेशान करने या जेल में डालने की बात हो रही है, या फिर लोग ये भी कह रहे हैं की बाहुबली मुसलमान है, इसलिए लोगों को समस्या हो रही है. ये कैसी बात है की जब किसी मुसलमान के द्वारा अपराध किया जाय, तो सब एक तरफ से इस्लाम या मुसलमान, ऐसा नहीं करता का ढोल पीटने लगते हैं और दूसरी तरफ शहाबुद्दीन जैसा अपराधी मुसलमान हो जाता है. कुछ लोग ये भी कह रहे है की दोष प्रमाणित नहीं हुआ है, तो फिर गुजरात के दंगे में न्यायालय ने तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी को दोषमुक्त किया था, फिर कोई उसे दंगे का दोषी क्यूँ मानें? लेकिन हम सब जानते हैं और तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहार वाजपेयी ने भी कहा था की गुजरात सरकार ने “राजधर्म” नहीं निभाया था. वैसे यहाँ कितने शहाबुद्दीन जैसे अपराधी हैं जिन पर दोष साबित हो जाता है? आम नागरिक तो अंडे चुराने के आरोप जेल की सजा काट आता है. कौन नहीं जानता की सिवान शहर बिहार राज्य का एक जिला नहीं बल्कि शहाबुद्दीन का इलाका है और शहाबुद्दीन, उस सिवान जनपद के स्वामी हैं. हमसब यहाँ बैठकर जो कुछ भी देखना चाहें वो देख सकते हैं, जैसे की वहाँ पुलिस कप्तान और उसकी पूरी बटालियन, जिलाधीश और उनकी कार्यकारणी, लोअर कोर्ट और न्यायायिक वयवस्था, लेकिन क्या ये सब बिहार राज्य-सरकार के अधीन काम करते हैं? जबाब वहाँ रहने वाले लोगों से पूछा जाना चाहिए, वो भी नाम न बताने का आश्वासन देते हुए. जब किसी आरोपी का इतना बड़ा काफिला हो तो “सवाल-जबाब” का कोई औचित्य नहीं रह जाता. इतिहास गवाह है कि, ऐसी कोई भी आवाज जो शहाबुद्दीन के खिलाफ उठी वो दर्दनाक चीख में बदल गयी. अगर ज्यादातर मुसलमान, शहाबुद्दीन को अपना नेता मानते हैं और ये १५०० गाड़ियों का काफिला उसका परिणाम है तो बात साफ़ है की कई साल बाद भी सच्चर कमिटी जैसी रिपोर्ट आएँगी और उसमें मुसलमान की स्थिति और भी भयावह होंगी. शहाबुद्दीन के जेल जाने के बाद सिवान शहर में जैसे एक नई सुबह की शुरुआत हो गयी थी. पहली बार वहाँ कोई और विधायक या सांसद भी बन गया था. शहाबुद्दीन की पत्नी संसदीय चुनाव हार गयी थी. सवाल है की ऐसा पहली बार क्यूँ हुआ था? क्यूंकि अब वहाँ शहाबुद्दीन नहीं था, मतलब “डर” नहीं था. प्रजातंत्र बिना डर के ही तो फलता-फूलता है. ये वही शहाबुद्दीन है जिस पर जे एन यु छात्र संघ के अध्यक्ष चन्द्रशेखर उर्फ़ चंदू की सरे आम बाजार में हत्या का आरोप है., अगर जनता सब जानती है तो वो ये भी जानती हीं होगी. बाहुबलियों के उस दौर में शिल्पी जैन और उसके दोस्त का सामूहिक बलात्कार और निर्मम हत्या हुयी थी और दोनों की लाश पटना के गाँधी मैदान में फेंक दी गयी थी. आज भी गाँधी मैदान चीख-चीख कर न्याय मांग रहा है. बिहार एक समय में सरकार के कानून से नहीं बल्कि बाहुबलियों के कानून से चलता था. इस तरह के बाहुबलियों की रिहाई, राज्य में टूटती न्यायिक वयवस्था और पुलिसिया गठजोड़ का जीता-जगता उदहारण हैं. ये कैसे हो जाता है की इसी पुलिस ने शहाबुद्दीन के खिलाफ तमाम साक्ष्यों के आधार पर कार्यवाही की थी और आज वही पुलिस उसे साक्ष्य नहीं दिखा पा रही है. शहाबुद्दीन के पक्ष में भी हजार तर्क गढ़ दिए जायेंगे लेकिन शाहबुद्दीन का सच कौन नहीं जानता. बिहार में नितीश कुमार मुख्यमंत्री हैं और जो कुछ उम्मीद भी है, वो उनसे हीं है. बिहार में जंगल राज की वापसी हो रही है या नहीं, पता नहीं, लेकिन बिहार में “न्याय के साथ विकास” के नारे पर, यह रिहाई गहरा आघात है. “सामाजिक न्याय” के नाम पर हम शहाबुद्दीन को भी अगर सही मानने लेंगे, तो हम समाज हीं नहीं रह जायेंगे, हमारी राजनीती तो वैसे भी, राजनीती रह नहीं गयी है. शहाबुद्दीन की रिहाई का काफिला, नितीश कुमार के बिहार के ऊपर वो तमाचा है जिसके दर्द से बिहार अगले कई दशकों तक निकल नहीं पायेगा. इस तरह के काफिले और बाहुबली, बिहारियों के उस जख्म को ताजा कर देते हैं जिससे वो महज एक दशक पहले उबरे थे. लोग शहाबुद्दीन की रिहाई को जमानत भर मात्र मानते हैं लेकिन असल में बिहार में न्याय की जमानत जब्त हो चुकी है.

दीपक भास्कर

sept 15 2016

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