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Showing posts from September, 2020

फेल बच्चे नहीं, आप हुए हैं.

  बिहार इंटरमीडिएट का रिजल्ट हर साल खबर बनाता है. पिछले साल रूबी राय के टॉपर होने पर खबर और अब बड़ी संख्या में छात्रों के फेल होने की खबर. सरकार के शिक्षा मंत्री ने, इस रिजल्ट को ऐतिहासिक बता कर अपनी पीठ थपथपा लिया है. प्रशासन ने कदाचार पर काबू पाने का तमगा, अपने गले में लटका लिया है. ओपोजिसन पार्टी ने सारा ठीकरा सरकार पर फोड़ दिया है. अभिवावक ने भी बच्चों पर सारा दोष मढ़ दिया है. समाज ने हर साल की तरह, पास हुए बच्चों का आएएस बनना तय कर दिया है. सच है कि “सक्सेस हैज मैनी फादर बट फैलीयर इज एन ऑर्फ़न ”. फेल हुए बच्चे, अपराधिक छवि लिए घर के किसी कोने में बैठे हैं. जो बच्चे फेल होकर कुछ गलत करने का सोच रहे हों उनसे कहना है कि मैं दो ऐसे छात्रों को जानता हूँ जो इंटरमीडिएट की परीक्षा में फेल हुए थे और आज एक आएएस तो दूसरा दिल्ली विश्विद्यालय में लेक्चरर है.   बहरहाल, छात्रों के ऊपर दोष मढ़ देने से बाकि सब दोषमुक्त कतई नहीं हो जायेंगे. आज सवाल छात्रों से किया जा रहा है कि वो पढ़ नहीं रहे हैं, मेहनत नहीं कर रहे हैं, अगैरह-वगैरह. तो क्या पढ़ने के लिए सिर्फ छात्र की जरुरत होती है. शायद हम भूल र...

रिजल्ट आ गया है, जाइये मस्ती कीजिये.

  सीबीएसई का रिजल्ट आ गया है. इस बार लाखों की संख्या में छात्रों ने नब्बे प्रतिशत से भी ज्यादा अंक पाए हैं. लेकिन किसी के चेहरे पर कोई ख़ास ख़ुशी नहीं दिख रही है. किसी को बधाई भी दीजिये तो वह खुश होने के बजाय यह पूछ लेता है की दिल्ली विश्विद्यालय के नार्थ कैंपस में या लेडी श्रीराम में एड्मिसन हो जायेगा?   ऐसा लगता है मानों नार्थ कैंपस या लेडी श्रीराम में न पढ़े तो फिर पढना बेकार है.   कभी बचपन में, मेरे गाँव वाले मुझे कहते थे की पढ़ना कभी बेकार नहीं होता. दोस्त! अगर किसी कॉलेज में पढ़ने मात्र से पढ़ने की प्रक्रिया सफल हो जाती तो कबीर, रैदास, बुद्ध जैसे लोगों को किस श्रेणी में रखेंगे. मेरा भी १०वी का रिजल्ट आया था. गाँव का पहला व्यक्ति फर्स्ट डिविजन से पास किया था. पूरा गाँव खुश था, सबने मिलकर भोज दिया था. १२वी में भी फर्स्ट क्लास हुआ था. खुश होकर पापा ने नयी पेंट-शर्ट दिलाया था. मैं रिजल्ट से ज्यादा, नए कपडे पाने की वजह से खुश था. पटना में जौंडिस की बीमारी जोरों पर थी सो दिल्ली चला आया. फिर दिल्ली विश्वद्यालय के कट ऑफ़ के आंकड़ों को न छूने के कारण, स्कूल ऑफ़ ओपेन लर्निंग में फर्स्...

दहेज़ हमें गौरवमयी इतिहास की रचना करने से रोक रहा है.(दहेज डायरी से पार्ट फाइव)

  दहेज़ लगभग एक न खत्म होने वाली समस्या बनती जा रही है. लेकिन मेरी यह दहेज़ पर लिखी सीरीज का अंतिम पायदान पर है. यह अंतिम इसलिए भी है की क्यूंकि मैंने अपने जीवन में इस दानवी परंपरा का अंत करने की सोच लिया है. जब यह सीरीज लिखी जा रही थी तो चौथे अंक के बाद बिहार के मुख्यमंत्री ने सार्वजनिक तौर पर एलान किया कि दहेज़ का अंत होना चाहिए. हर सरकारी दफ्तरों में दहेज़ के खिलाफ लड़ने के लिए शपथ ली जा रही थी. एक संघर्षशील व्यक्ति सबसे ज्यादा आशावादी होता है. मुझे उम्मीद है कि यह समाज एक दिन, अपने बीच कैंसर की तरह फ़ैल रहे इस बीमारी को जड़मूल नाश करेगा. बहरहाल, इस राक्षसी नियम को परम्परा के नाम पर यह समाज ज्यादा दिन तक ढो नहीं सकता.  समाज तो गतिशील होता है और जिस समाज में जड़ता आ जाये वो ज्यादा दिन तक समाज भी नहीं रह जाता.  भारतीय समाज ने इतिहास में ऐसी कई दानवी परम्पराओं को खत्म कर अपनी गतिशीलता का परिचय दिया है. भारत एक गतिशील समाज है शायद यही वजह है की यह सदियों से भारत बना हुआ है. मैं खुद बिहार से हूँ इसलिए बिहार को पृष्ठभूमि के तौर पर रखता हूँ अन्यथा दहेज़ की समस्या राष्ट्रिय और विदेशों ...

दहेज़ लेने वाले लड़के फायदे में नहीं बल्कि नुकसान में हैं (दहेज़ डायरी से पार्ट फोर)

  मैं उससे, शादी नहीं करना चाहती हूँ.   उसे दहेज़ लेना है, सामाजिक समझौता करना है, पर मुझे तो शादी करनी हैं, मेरे सपनों को साकार करने वाले से नहीं बल्कि मुझे, मेरे सपनों को साकार करने देने वाले से.   कुछ दिन पहले पटना में एक लड़केवाले मुझे देखने आये थे. उन्होंने पूछा कि खाना बनाना आता है? मैं झूठ नहीं बोल पायी. उन्होंने मेरे घर वालों को खूब सुना दिया कि आपलोगों ने लड़की को खाना बनाना तक नहीं सिखाया. उन्होंने पटना खाना बनाने सीखने नहीं बल्कि पटना साइंस कॉलेज के केमिस्ट्री लैब में केमिकल रिएक्शन करने भेजा था. कभी-कभार लैब में, मैं इनलोगों के दिमाग को ठीक करने का केमिकल बनाने का प्रयास करती रहती हूँ. माँ ने दूसरा लड़का भी जल्द ही ढूँढ लिया. लड़का बीपीएससी से माइनर इरीगेशन डिपार्टमेंट में तीस हजार महीने वेतन पाने वाला असिस्टेंट एन्जिनीर है. उसका वजन भी महज तीस किलो ही है और दहेज़ की मांग तीस लाख है, साथ में एक भरी सोना, कपडा-लत्ता, जूता-मौजा, टोर्च-छाता, ब्रश-जिभिया-टूथपेस्ट, सेविंग किट, तेल-साबुन-सेंट, रुमाल-गमछा, चड्डी-बनियान, घड़ी-चश्मा, अंगूठी-चेन इत्यादि अलग से. क्या वो ये सब भ...

बिहार में दहेज़ के खिलाफ एक विद्रोह था- “धर-पकुड्वा विवाह”(दहेज़ डायरी से पार्ट थ्री)

  बिहार में दहेज़ की समस्या को लेकर जनमानस में एक आम सहमति है. लोग दहेज़ का विरोध भी करते हैं फिर भी सामाजिक प्रचलन के नाम पर दहेज़ ले लेते हैं. जब हर व्यक्ति इसे बुरा मानता है तो फिर ये समाज कौन है जिसके नाम पर यह चल रहा है? क्या समाज व्यक्तियों का समूह नहीं है? क्या समाज, किसी अलग दुनिया के लोगों से बना है? हम ही तो समाज हैं, फिर हम दोषारोपण किसपर कर रहे हैं.   गाँधी जी ने कहा था कि कुछ बदलाव देखना चाहते हो तो खुद को बदलो. असल में व्यक्ति अपनी कुकृत्यों को ढंकने के लिए भी कई बार समाज पर सारा दोष मढ़ देता है.   मुख्यरूप से, व्यक्ति जब समाज को दोषी बना रहा होता है तो उसे शायद ये पता नहीं कि वो खुद कठघरे में खड़ा है. किसी भी सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ विद्रोह का इतिहास, भारत में स्वर्णिम है.   वर्तमान समय ये विद्रोह बिहार के मुख्यमंत्री ने किया है. ऐसा ही एक विद्रोह, बिहार में दहेज़ के खिलाफ हुआ था.   दहेज़ के खिलाफ यह विद्रोह की कहानी नब्बे के दशक की है. इसे बिहार में ‘धर-पकडुआ वियाह’( फोर्स्ड मैरेज) के नाम से जाना जाता है. दहेज़ ने लोगों को इतना असहाय कर दिया था कि (शा...

बिहार में दहेज़, सरकारी नौकरियों में जाने की प्रेरणा है (दहेज़ डायरी से ‘पार्ट टू’)

  बिहार में सरकारी नौकरी का बड़ा क्रेज है. किसी बच्चे के नामकरण से पहले, उस पर किसी न किसी सरकारी नौकरी का ठप्पा डाल दिया जाता है.  किसी भी सरकारी नौकरी; रेलवे, बैंक, एसएससी, पीसीएस, आर्म फोर्सेज, आयआयटी, मेडिकल, टीचर, युपीएससी से लेकर प्रोफेसर तक, सभी में, बिहारियों की अच्छी खासी तादाद है. सरकारी नौकरी को लेकर इस तरह का मोटिवेसन शायद ही, किसी और राज्य में हो. इस मोटिबेसन के कई कारण हो सकते हैं लेकिन इसके मूल में दहेज़ में मिलने वाली रकम हीं है.   आज भी बिहार में सरकारी नौकरी के विभिन्न पदों के लिए अलग-अलग रेट फिक्स है. यह रकम पद के अनुसार लाख से करोड़ों तक भी जाता है. बिहारी गार्डियन अपने लड़के को यह कहकर पटना या दिल्ली भेजते हैं कि तुम जाओ, मैं सब जगह-जमीन बेचकर तुम्हारे पढाई का खर्चा उठाऊंगा . इमोशनल होकर वो कभी-कभी किडनी या शारीर का सारा खून भी बेच डालने की बात कह देते हैं . इतना बड़ा त्याग, देश में शायद ही कोई गार्डियन कर पाए परन्तु इस त्याग के पीछे, कहीं न कहीं बिकी हुई सारी चीजों एक झटके में वापस पा लेने की उम्मीद भी होती है. नौकरी लगते ही दहेज़ में मिली रकम से सब ठीक-ठा...

दहेज़ सामाजिक समस्या नहीं बल्कि सामाजिक प्रतिष्ठा का प्रमाण है (दहेज़ डायरी से प्रथम पार्ट-द बेगीनिंग)

  दहेज़(डावरी) हमारे समाज के टूटने की वो पराकाष्ठा है जहाँ आकर सब कुछ ठहर गया है. इससे निजात पाने के लिए तमाम रास्ते भी ढूंढे जा रहे हैं लेकिन कोई पुख्ता रास्ता निकलना अभी बाकि है.   मैं बिहार से ताल्लुक रखता हूँ इसलिए उसी की बात कर रहा हूँ हालाँकि इसमें कोई दो राय नहीं कि दहेज़ एक राष्ट्रीय मुद्दा है, शायद अन्तराष्ट्रीय भी हो.   बिहार में दहेज़ की समस्या का ऐतिहासिक जड़ खोजना, मेरे लिए मुश्किल है, निस्संदेह! यह नयी समस्या नहीं है. बिहार में, दहेज़ इतना विकराल रूप ले चुका है कि मुख्यमंत्री नितीश कुमार को राज्यवासियों से अनुरोध किया है कि हम दहेज-युक्त शादियों का बहिष्कार करें. इसके बावजूद बिहार में दहेज़ का व्यवसाय तेजी से फल-फूल रहा है.   दुसरे व्यवसायों में कई बार उतार-चढाव देखने को मिल सकता है लेकिन दहेज़ के व्यवसाय में गिरावट का कोई रिस्क कतई नहीं है. बिहार में दहेज़ कोई सामजिक समस्या नहीं माना जाता है बल्कि यह सामजिक प्रतिष्ठा का प्रमाण है.  दहेज़ की रकम से ही, समाज में आपके स्थान और ओहदे का पता चलता है. मतलब, दहेज़ कम मिला तो आप समाज के निचले पायदान वाले लोग हैं और ...

बाहुबली और महिस्मती भारत की कल्पना नहीं है.

  बाहुबली, इस देश की सबसे बड़ी फिल्म है. बाहुबली को मिलने वाला प्यार, कतई अस्वाभाविक नहीं है.   कई लोग इसे मोदी जी की, कल्पना का भारत मान रहे हैं. यह मोदी जी के दौर की फिल्म है. मोदी जी, भारत को महिस्मती साम्राज्य जैसा बनाना चाहते हैं.   अगर ऐसा है तो अब इस दौर की फ़िल्में, कल्पना से भी परे, परिकल्पना में जाने लगे हैं.ये सच है कि कल्पना का यह ऐसा दौर है, जिसमें सच कहीं नहीं, वास्तविकता से कोई लेना-देना नहीं है. सब कुछ कल्पना में ही हो रहा है. एक ‘नया भारत’ भी कल्पना है.   जो फिल्में हमें सच दिखाती हैं वो इस देश में कभी बड़ी फिल्म नहीं बन पाती हैं.   हाँ! ये अलग बात है की अब उन फिल्मों को भी सराहा जाने लगा है. अगर यह मोदी के दौर का फिल्म है और यह मोदी के कल्पना का चित्र है तो इससे छोटी फिल्म इस देश कभी नहीं बनी.   फिल्में समाज का आइना होती हैं, समाज में क्रांतिकारी सोच और परिवर्तन का जरिया होती हैं.  अगर ये फिल्म मोदी के दौर की फिल्म है तो हर साल दो करोड़ नौकरियां, सबके खाते में पंद्रह लाख रूपये, कश्मीर की समस्या का निदान, राम मंदिर बन जाना और भी हजार बातें...

एनफ इज एनफ

  ……………… “एनफ इज एनफ”; “हमारे सैनिको की प्राणों की आहुति निरर्थक नहीं जाएगी”; “पकिस्तान को सबक सिखाना जरुरी हो गया है”; “पाकिस्तान को उसी की भाषा में जवाब दिया जाना चाहिए”; “हम दो के बदले दस सिर काट लायेंगे”; “हम पकिस्तान के कुकृत्यों की घोर निंदा करते हैं”; “बस बहुत हो गया”; “एक अन्तिम युद्ध हो हीं जाना चाहिए”… ………….. एक अंतिम युद्ध! हर युद्ध से पहले कहा गया था, कि यह अंतिम युद्ध है.  मानवीय इतिहास तो युद्ध का हीं इतिहास है. जो समयांतराल हमें शांति का लगता है, वो असल में ‘युद्ध-विराम’ का है.  धर्म(न्याय) की स्थापना के लिए भी युद्ध लड़ें गये तो क्या न्यायपूर्ण अथवा समतामूलक समाज का निर्माण हो गया? अगर हो गया तो फिर दूसरा युद्ध क्यूँ हुआ? हम पाकिस्तान के कुकृत्यों की घोर निंदा कर रहे हैं. लगभग हर रोज सैनिक मारे जा रहे हैं. बस बहुत हो गया! युद्ध हीं एक मात्र उपाय बचा है.  तो क्या इस बार युद्ध एक दुसरे को फूल देकर लड़ें जायेंगे? जब बन्दूक और टैंक होंगे तो हजारों/लाखों सैनिक मारे जायेंगे. तब हम किसकी निंदा करेंगें, युद्ध की या पकिस्तान की?  हम जब इन घटनाओं की भर्तसना ...

कश्मीर: फूल फेंकने वाले अब पत्थर फेंकने लगे हैं.

  अभी हाल ही में ,  कश्मीर में हुए उपचुनाव में बहुत कम वोटिंग हुई है .  पोलिंग बूथ पर जगह – जगह अलगाववादियों ने जमकर पत्थर फेंके हैं .  पत्थर फेंकने वालों में सभी उम्र के लोग हैं शायद वो भी जिन्हें बमुश्किल पता हो कि वो पत्थर क्यूँ फेंक रहे हैं .  अलगाववादियों द्वारा कई दशकों से चलाये जा रहे इस संघर्ष में जान – माल का जो नुकसान हुआ है उसका हिसाब करना बहुत मुश्किल है .  लेकिन सबसे बड़ा नुकसान कश्मीर की आत्मा  “ कश्मीरियत ”  का हुआ है जिसकी भरपाई लगभग नामुमकिन है .  कई लोग बार – बार ये सवाल पूछ देते हैं की  “ कश्मीरियत ”  क्या है ?  सबका साथ और सबके साथ ‘  हीं तो  “ कश्मीरियत ”  है .  हिंसा के बदले अहिंसा ;  पत्थर और बारूद के बदले केसर और गुलाब का फूल हीं तो  “ कश्मीरियत ”  है .  किसी भी मनुष्य में इन्सान को देख लेना ,  किसी के दर्द को कम करने के लिए अपने को फ़ना कर देना हीं  “ कश्मीरियत ”  है .  बहरहाल ,  कश्मीर में ये सब अब बिलकुल नहीं दीखता .  ये अलग बात है कि...