बिहार में दहेज़ के खिलाफ एक विद्रोह था- “धर-पकुड्वा विवाह”(दहेज़ डायरी से पार्ट थ्री)
बिहार में दहेज़ की समस्या को लेकर जनमानस में एक आम सहमति है. लोग दहेज़ का विरोध भी करते हैं फिर भी सामाजिक प्रचलन के नाम पर दहेज़ ले लेते हैं. जब हर व्यक्ति इसे बुरा मानता है तो फिर ये समाज कौन है जिसके नाम पर यह चल रहा है? क्या समाज व्यक्तियों का समूह नहीं है? क्या समाज, किसी अलग दुनिया के लोगों से बना है? हम ही तो समाज हैं, फिर हम दोषारोपण किसपर कर रहे हैं. गाँधी जी ने कहा था कि कुछ बदलाव देखना चाहते हो तो खुद को बदलो. असल में व्यक्ति अपनी कुकृत्यों को ढंकने के लिए भी कई बार समाज पर सारा दोष मढ़ देता है. मुख्यरूप से, व्यक्ति जब समाज को दोषी बना रहा होता है तो उसे शायद ये पता नहीं कि वो खुद कठघरे में खड़ा है. किसी भी सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ विद्रोह का इतिहास, भारत में स्वर्णिम है. वर्तमान समय ये विद्रोह बिहार के मुख्यमंत्री ने किया है. ऐसा ही एक विद्रोह, बिहार में दहेज़ के खिलाफ हुआ था. दहेज़ के खिलाफ यह विद्रोह की कहानी नब्बे के दशक की है. इसे बिहार में ‘धर-पकडुआ वियाह’( फोर्स्ड मैरेज) के नाम से जाना जाता है. दहेज़ ने लोगों को इतना असहाय कर दिया था कि (शादी जिसमें लड़के-लड़की की सहमति के साथ-साथ पारिवारिक सहमति भी जरुरी होती थी) लोगों ने लड़के को अगवा कर विवाह कराना शुरू कर दिया था. मुझे याद है इस विद्रोह का डर इतना समां गया था कि लोग अपने लड़के को किसी के बरात में भेजने से भी कतराते थे. लड़कों ने अकेले कहीं भी दुसरे जगह जाना बंद कर दिया था. पहली बार पितृसत्ता के पुरोधा मर्द, अब डरने लगे थे, सहमने लगे थे. लड़कों ने “मर्द को दर्द नहीं होता” जैसा डायलोग बोलना बंद कर दिया था.
हालाँकि “धर-पकुड्आ वियाह” के तौर-तरीके निस्संदेह सही नहीं थे लेकिन जब समाज ही लूटेरा बन चुका हो तो उसमें साधन पर बहस की कोई गुंजाईश नहीं रह जाती है. दिनों-दिन दहेज़ की बढती रकम के कारण “धर-पकुड्आ वियाह” को मान्यता मिलने लगी थी. इसकी मुख्य वजह, गरीब लड़की वालों का लगातार तिरस्कार था. इसमें लड़के को बन्दूक की नोंक पर उठा लिया जाता था और फिर पूरी पहरेदारी में तमाम रीति-रिवाज के साथ उसका विवाह लड़की से करा दिया जाता था. इस घटना में लड़के के रिश्तेदार की अहम् भूमिका होती थी. रीति-रिवाजों को निभाने में लड़के की आना-कानी पर उसकी थोड़ी पिटाई भी की जाती थी. सिंदूर-दान के समय लड़के का डर देखने लायक होता था. आजतक की शादियों में हमने लड़की को सहमे और डरे हुए देखा था लेकिन इस शादी में लड़के को सहमा हुआ किसी लड़की ने पहली बार देखा होगा. शादी के बाद लड़की-लड़के को एक कमरे जिसे “कोहबर घर” कहते हैं, में सुहागरात के लिए छोड़ दिया जाता था. अब यह लड़की के ऊपर निर्भर करता था कि वो उससे कैसे शारीरिक सम्बन्ध स्थापित कर ले. एक दुसरे का मन मिले या ना मिले लेकिन शादी में शारीरिक मिलन कितना जरुरी होता है. इस तरह का विचार ही, मनुष्य में आत्मा का न होने का प्रमाण भी है. कुछ दिनों तक यही प्रक्रिया चलती थी. अब नव-विवाहित जोड़ी को स-सम्मान लड़के के घर पर भेज दिया जाता था. फिर लड़के वाले का विद्रोह शुरू होता था. दोनों गाँव की पंचायत बैठती थी और एन-प्रकारेण इसको सुलझा लिया जाता था. लेकिन विडम्बना देखिये, यह विवाह भी दहेज़ से मुक्त नहीं होता था. पंचायत, थोडा-बहुत दहेज़ दिलवा ही देती थी. हालाँकि यह रकम काफी कम और कई बार नहीं भी होती थी. कुछेक बार मामला पंचायत से बाहर पुलिस में भी जाता था और पुलिस भी इसे मिलाजुला कर सेटल कर देती थी. कई बार ऐसी शादियों सफल भी हुई. सफल होने के लिए जरुरी था लड़की का सुन्दर होना. यह इस बात का प्रमाण है कि हम रंगभेद से कितने ग्रसित हैं. लेकिन मन मुताबिक दहेज़ न मिलना और लड़की का सुन्दर नहीं होने के कारण, कई शादियां सफल नहीं हो पायी. वैसे तो लड़कियों को किसी भी तरह की शादी में बहुत बड़ा स्थान प्राप्त नहीं था लेकिन ‘धर-पकडुआ वियाह’ के बाद लड़की की मानसिक यातना बढ़ जाती थी. उसे नौकरानी से बड़ा दर्जा शायद कभी नहीं मिल पाता था. ऐसी शादियाँ ज्यादातर गरीब लड़की वाले के द्वारा किया जाता था. लड़की को बार-बार लड़के वाले उसकी निर्धनता का एहसास कराते रहते थे.
वैसे ये शादियाँ ऊँची जाति के लोगों में सीमित थी. कई बार, जिन्हें लड़की पसंद थी और माँ-बाप दहेज़ के कारण शादी से इनकार करते थे, तो लड़के धर-पकुड्वा ग्रुप के पास जाकर खुद भी किडनैप हो जाते थे. धर-पकुड्वा विवाह ने समाज को काफी डरा दिया था और अब दहेज़ की मांग की रकम घटने लगी थी. बहरहाल, दहेज़ ने बढ़ते सेंसेक्स आंकड़ों के साथ खूब उछाल मार दिया है. अभी तक हम सिर्फ लड़की के नुक्सान को देख रहे थे, धर-पकुड्वा विवाह से यह साफ़ था दहेज़ लेने का नुक्सान लड़कों को भी हो रहा था. दहेज़ से कैसे लडको को नुक्सान होता है, दहेज़ डायरी के अगले पार्ट में.
डॉ दीपक भास्कर, दिल्ली विश्विद्यालय के दौलत राम कॉलेज में राजनीति पढ़ाते हैं.
May 23 2017
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