मुझे नहीं पता मेरा देश/मेरी सरकार कौन सा है.

 भारत के कई गाँव ऐसे रहे हैं जिन्हें भारत के आजाद होने की खबर कई दिनों बाद मिली थी. वो खबर भी भारत के अंग्रेजों से आजाद हो जाने की थी. उनपर इस आजादी का ज्यादा कोई असर नहीं हुआ था वो शायद इसलिए भी क्यूंकि भारत अंग्रेजों से आजाद तो हो गया था लेकिन ये लोग तो अंग्रेजों के गुलाम कभी भी नहीं थे, ये लोग तो भारतीयों की हीं गुलामी कर रहे थे वो भी अंग्रेजों के आने के हजारों साल पहले से हीं. वैसे भी अंग्रेजों ने तो पूरे भारत पर खुद शासन किया भी नहीं था, ब्रिटिश भारत तो बहुत छोटा हीं था. सो किस बात की आजादी? कल भी जमींदार थे और वो आज भी थे, कल भी वो नीची जाति से थे वो आज भी हैं. कल भी गरीब थे, आज भी हैं. आने वाली प्रजातांत्रिक सरकारों ने जमींदारी प्रथा खत्म कर दी थी लेकिन जमींदार अब भी जमींदार थे और मजदूर अब भी मजदूर. लेकिन एक अजीब चीज हुई थी अब जमींदार गाँव की पंचायत से संसद भवन पहुँच चुके थे और साथ में कुछ गरीब-मजदूरों को भी ले गए थे ताकि वो देख सकें की ये जमींदार अब गरीबों के प्रति कितना स्नेही हो गए हैं. असल में वो अब तक एक गाँव के जमींदार थे और पूरे देश के.

इधर संसद में आजाद मुल्क को और आजाद करने के लिए काफी कुछ किया जा रहा था और इन सबका फर्क अंग्रेजो से हुए आजाद मुल्क में अवश्य पड़ रहा था, जगह-जगह लोगों को रोजगार मिल रहे थे, उनके जीवनस्तर में काफी बदलाव भी हो रहा था. लेकिन वो मुल्क अंग्रेजों का गुलाम नहीं था उनके जीवन में कुछ ख़ास असर कभी भी नहीं था. उधर जमींदारी तो ख़त्म हो गयी थी, कुछ लोगों को संसद के जमींदार साहब ने जमीन बाटी भी थी शायद वो इसलिए भी की उस छोटे से जमीन के पट्टे के बदले में उन्हें इनलोगों के वोट कई शतकों तक मिलेंगे. ज्यादातर लोग आज भी जमीन के मालिक नहीं थे, हाँ उनके पास बटाई की जमीन थी, और बहुतों के पास आज भी जमीन का एक भी पट्टा नहीं था. वो आज भी कोई सवाल नहीं पूछते. उनके लिए कोई सरकार नहीं, उन्होंने किसी भारत को नहीं देखा. एक आदमी सुबह के चार बजे उठता है और अपनी भैंस को लेकर सुबह वाले अँधेरे में चराने चला जाता है, वहां से लौटकर भैंसों को चार-पानी देकर, खुद नास्ता कर, हल उठाकर खेतों में चला जाता है, वहां से आकर दिन का भोजन करता है और गाँव के चौपाल पर बैठकर ताश खेलता है. वहां से आकर मछली मारने की लग्गी उठाकर नदी किनारे बैठकर मछली मारता है. रात के भोजन के बाद तेरुआ लेकर रस्सी बनाता है और फिर सो जाता है. अब सवाल यह है कि इस जीवन में सरकार कहाँ है? उसे किसी सरकार से कोई लेना देना नहीं. ऐसा भी नहीं है कहीं कुछ हुआ हीं नहीं है लेकिन इस बात में कोई आशंका नहीं की यहाँ कुछ नहीं हुआ है.

Deepak Bhaskar

Feb 17 2017

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