एनफ इज एनफ

 ………………“एनफ इज एनफ”; “हमारे सैनिको की प्राणों की आहुति निरर्थक नहीं जाएगी”; “पकिस्तान को सबक सिखाना जरुरी हो गया है”; “पाकिस्तान को उसी की भाषा में जवाब दिया जाना चाहिए”; “हम दो के बदले दस सिर काट लायेंगे”; “हम पकिस्तान के कुकृत्यों की घोर निंदा करते हैं”; “बस बहुत हो गया”; “एक अन्तिम युद्ध हो हीं जाना चाहिए”……………..

एक अंतिम युद्ध! हर युद्ध से पहले कहा गया था, कि यह अंतिम युद्ध है. मानवीय इतिहास तो युद्ध का हीं इतिहास है. जो समयांतराल हमें शांति का लगता है, वो असल में ‘युद्ध-विराम’ का है. धर्म(न्याय) की स्थापना के लिए भी युद्ध लड़ें गये तो क्या न्यायपूर्ण अथवा समतामूलक समाज का निर्माण हो गया? अगर हो गया तो फिर दूसरा युद्ध क्यूँ हुआ?

हम पाकिस्तान के कुकृत्यों की घोर निंदा कर रहे हैं. लगभग हर रोज सैनिक मारे जा रहे हैं. बस बहुत हो गया! युद्ध हीं एक मात्र उपाय बचा है. तो क्या इस बार युद्ध एक दुसरे को फूल देकर लड़ें जायेंगे? जब बन्दूक और टैंक होंगे तो हजारों/लाखों सैनिक मारे जायेंगे. तब हम किसकी निंदा करेंगें, युद्ध की या पकिस्तान की? हम जब इन घटनाओं की भर्तसना करते हैं, तो क्या युद्ध की करेंगे? युद्ध अगर शांति का मार्ग प्रशस्त करता तो क्या किसी युद्ध के बाद कोई और युद्ध होता?

हम पाकिस्तान को उसकी भाषा में जवाब देंगे. दो के बदले दस नरमुंड काट लायेंगे. तो क्या हम अब उनकी भाषा सीखेंगे? क्या वह भाषा इतनी अच्छी है, जिसे अब हमें सीख लेना चाहिए. क्या उस भाषा में शांति का प्रसार निहित है? तो क्या हम कलिंग युद्ध के दौरान जो भाषा सीख गए थे, अब इतनी अप्रासंगिक हो गयी है? क्या बुद्ध और जैन की भाषा अब हमें सूट नहीं करती? जिस भाषा को बुद्ध ने पूरे संसार को सिखाया, अब उस पर हमारा विश्वास नहीं? गाँधी ने जिस भाषा से अत्यचारी अंग्रेजों से भारत को मुक्त करा लिया, उससे हमारा कोई सरोकार नहीं? पकिस्तान के पास जो भाषा है तो क्या उसकी प्रासंगिकता के मद्देनजर, अब हमें अपने स्कूलों और विश्विद्यालयों में पढ़ाना शुरू कर देना चाहिए? सोचिये! हम अपने बच्चों को अंतिम-अंतिम तक शांति, धैर्य और संयम रखने की शिक्षा देते रहते हैं. क्या अब हम उन्हें दूसरों के सर काट लाने को कहेंगे?

पाकिस्तान को अब सबक सिखाना हीं पड़ेगा. तो हम कौन सा सबक सिखायेंगे? क्या हम बुद्ध, जैन या गाँधी वाला सबक सिखायेंगे या फिर हमने पकिस्तान से, ये सबक भी सीख लिया है. कभी हम विश्व-गुरु होते थे. तो क्या हम अब शिष्य हो गए हैं वो भी पकिस्तान के? क्या हमें अब अपने इतिहास पर गुमान नहीं रह गया है? क्या सैन्धव सभ्यता से हमारा कोई लेना देना नहीं रह गया है?

हमारे सैनिकों के प्राण की आहुति व्यर्थ नहीं जाएगी. तो क्या सैनिक का प्राण सिर्फ युद्ध और फिर, एक नए युद्ध के लिए होता है? क्या सैनिक शांति के लिए अपने प्राण नहीं गंवाता है? अगर उनके शहीद होने के बाद भी शांति नहीं हो तो क्या सैनिक के प्राण व्यर्थ नहीं हो जायेंगे? एक सैनिक अपने प्राण की आहुति, अंतिम प्राण की आहुति समझ कर देता है. उसे यह उम्मीद होती है की उसके प्राण के बाद और कोई प्राण नहीं जायेंगे. फिर एक नए युद्ध से उनका शहीद होना सार्थक कैसे हो जायेगा?

एनफ इज एनफ! शांति प्रक्रिया की शुरुआत होनी ही चाहिए. लेकिन हमें देश के और मुद्दों पर भी तो यही नारा देना चाहिए. सबक लेना हो तो तुनिशिया से लेना चाहिए. उत्तरी अफ्रीका के देश तुनिशिया में २०१० में हुए आंदोलनों में, ‘एनफ इज एनफ’ ही नारा था. वह नारा जिसने कई दशकों की बेरोजगारी, असमानता के खिलाफ जनमानस को एक साथ खड़ा कर दिया था. महज सात दिनों में सत्तारूढ़ बेन अली को देश छोड़ना पड़ा था. तो क्या हमारे देश में सब कुछ ठीक है? क्या बेरोजगारी ख़त्म हो गयी है? क्या हमने सामाजिक एवं आर्थिक विषमता से निजात पा लिया है? लेकिन हमारे हुक्मरान इन बातों पर हमें ध्यान देने से भी रोकते हैं. हम कब इन चीजों के खिलाफ “एनफ इज एनफ” कह देंगे? कब हम अपने सैनिकों के बलिदानों को सार्थक कर देंगे? सैनिक इसलिए भी जान देते हैं की देश के अन्दर विकास का रथ रुके नहीं, लोगों के लिए रोजगार पैदा हों, देशवासी अपने लिए एक बेहतर जिंदगी तलाश सकें. तुनिशिया ने वह कर दिखाया, उन्होंने मुहम्मद बौआजीजी के बलिदान को व्यर्थ नहीं जाने दिया. हमारे हुक्मरान, सैनिकों के बलिदान व्यर्थ कर देते हैं जब वो एक नए युद्ध की कल्पना कर डालते हैं. अपने बन्दूक के बैरल को रोज सुबह साफ़ करने वाला सैनिक, दुआ करता है की आज इसे चलाना न पड़े, क्यूंकि बन्दूक किसी की जान ही लेगा, जिंदगी तो नहीं दे सकता. वह इस बात को भलीभांति जानता है कि युद्ध शांति का मार्ग नहीं बल्कि हर युद्ध में अगले युद्ध का बीज होता है.

किसी से युद्ध कर लेने से सैनिकों का बलिदान सार्थक नहीं हो सकता, बल्कि सार्थकता तो शांति-प्रस्ताव में है, देश के अन्दर बढ़ती बेरोजगारी, असमानता के खिलाफ “एनफ इज एनफ” का नारा बुलंद करने में है. हम मुल्क हैं, अंगुलिमाल के बुद्ध-भिक्षु बनने की उम्मीद का और शांति प्रक्रिया से उम्मीद ख़त्म होना, हमारे “मुल्क” के होने पर सवाल खड़ा करता है.

दीपक भास्कर, जेएनयु से पीएचडी हैं तथा दिल्ली विश्विद्यालय के दौलतराम कॉलेज में राजनीती शास्त्र के व्याख्याता हैं.

दुनिया के मजदूरों को एक हो जाना चाहिए

आज एक मई है और इस दिन को दुनिया भर में “अंतर्राष्ट्रीय मजदूर दिवस” (इसे उन्नीसवीं सदीं में सेकंड कम्युनिस्ट इंटरनेशनल के द्वारा शुरू किया गया था) के रूप में भी जाना जाता है. सत्रहवीं शताब्दी के बाद औद्योगिक क्रांति और उससे पैदा हुआ उपनिवेशवाद, जिसने दुनिया भर को गुलामी के दौर में फिर से धकेल दिया था. हालाँकि उसके बाद मुल्क के आजाद होने का दौर शुरू हुआ लेकिन मुल्क आजाद होते गए परन्तु मजदूर गुलाम से भी बदतर जिन्दगी जीने को मजबूर हो गए थे. बहरहाल, अलग-अलग मुल्क की दशाएं अलग-अलग थी, मुल्क भी तो बाटें चले गए थे. ये जमीन का टुकड़ा तेरा तो ये मेरा. बस दो चीजे मुल्क के परे थी वह था पूंजीवाद और मजदूरों का शोषण. पूंजीवाद शोषक था और मजदूर शोषित और इन दोनों की दशा किसी भी मुल्क में एक जैसी ही थी. पूंजीवाद मुनाफाखोरी के लिए मजदूर का शोषण, उत्पीडन को हीं अपना आधार मान रहा था.

इसी सब के बीच विश्व इतिहास में कार्ल हेनरिक मार्क्स का पदार्पण हुआ जिसने पूंजीवाद के शोषक चरित्र को बखूबी पहचाना और इससे निजात पाने का समाधान और एक शोषणरहित समाज की कल्पना भी की. मार्क्स ने यह पहचाना कि पूंजीवाद मानव को मानव से अलग कर देगा और मानवीय वेदना से इंसान का विच्छेद हो जायेगा. लोग बरबस एक मशीन बनकर रह जायेंगे. वहीं मशीन जिसे कितनी देर भी कम कराया जाये, उसे दर्द नहीं होगा, वह थकेगा नहीं, वह कुछ बोलेगा नहीं, बस काम करता जायेगा, वह भी किसी और के बेहतर जीवन के लिए और वह कभी मुखालफत भी नहीं करेगा क्योंकि वह अलग-अलग कर दिया गया है. जिस तरह पूंजीवाद का कोई राष्ट्र नहीं होता, उसी प्रकार मजदूरों को पहले उसके राष्ट्र, समाज और परिवार से अलग कर दिया जायेगा. यहाँ के मजदूर वहां और कहीं और के कहीं और.

पूंजीवाद की मुखालफत करते हुए कार्ल मार्क्स ने कहा कि पूंजीवाद का शोषक चरित्र अन्तराष्ट्रीय है और इस वयवस्था से लड़ने के लिए दुनिया भर के मजदूरों को भी एक होना पड़ेगा. मजदूर चाहे किसी भी देश या महादेश में हों, उनके शोषण से ही पूंजीवाद खड़ा रहता है. सोचने वाली बात है पूंजीवाद एक ऐसा शोषण तंत्र हैं जिसमें गरीब मजदूर और गरीब होते जा रहे हैं. मानवीय मूल्य ढहते जा रहे हैं. एक गरीब अगर ५० रूपये का मोबाइल रिचार्ज करवाता है तो उसके २ रूपये कट जाते हैं और एक सम्ब्रांत व्यक्ति अगर २००० का रिचार्ज करवाता है तो उसे ५०० रूपये का कैशबैक मिलता है. यह अमीर को और अमीर बनाने की व्यव्य्स्था नहीं तो और क्या है? हर देश की सरकारें( जिसे मार्क्स ने पूंजीवादियों के लिए कम करने वाली कमिटी कहा था) अपने नुमायीय्न्दों का वेतन हर छः माह पर बढाती रहती है परन्तु मजदूरों का न्यूनतम राशी महज एक रुपया(जैसे कि अभी हाल मनरेगा में मजदूरी एक रुपया बढाया गया है) बढाकर काम चला लिया जाता है. पूंजीवाद अब मानवीय मुखौटा भी पहन चुका है लेकिन उसका शोषक चरित्र आज और भी वीभत्स हो चूका है.

ऐसे में कार्ल मार्क्स ने सही हीं कहा था कि पूंजीवाद अगर एक है तो उससे संघर्ष भी एक होकर हीं करना पड़ेगा. अगर पूंजीवाद दुनियाभर के मजदूरों, गरीबों का शोषण कर रहा है, तो बस और कुछ नहीं बल्कि, दुनिया भर के मजदूरों को एक हो जाना चाहिए. जब तक मजदूर, गरीब उठ खड़ा नही होता तब तक हर व्यक्ति उसको अपने से बड़ा लगता है. मार्क्स ने कितना सही कहा था कि दुनिया के मजदूरों एक हो, तुम्हारे पास लोहे की जंजीरों के सिवा खोने को और कुछ भी नहीं. इस दुनिया के गरीब, मजदूर को एक दुसरे के लिए, पूंजीवाद के खिलाफ संघर्ष करना ही एकमात्र रास्ता है. इस शोषक व्यवस्था के खिलाफ सभी को एक हो जाना चाहिए. सैकड़ों साल बीत गए किन्तु आज भी प्रासंगिक है. आज भी मजदूर समाज के हाशिये पर रहने वाले लोग हैं. मजदूर मार्किट के नाम पर मानव द्वारा मानव की खरीद बिक्री जैसी व्यवस्था चल रही है. मई दिवस मन लेने भर मात्र से मजदूरों का समाधान नहीं बल्की पूंजीवाद के शोषक चरित्र को ख़त्म करने से ही मजदूर कल्याण हो पायेगा.

दीपक भास्कर, दिल्ली विश्विद्यालय में राजनीती के प्राध्यापक हैं.

May 10 2020

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