दहेज़ हमें गौरवमयी इतिहास की रचना करने से रोक रहा है.(दहेज डायरी से पार्ट फाइव)

 

दहेज़ लगभग एक न खत्म होने वाली समस्या बनती जा रही है. लेकिन मेरी यह दहेज़ पर लिखी सीरीज का अंतिम पायदान पर है. यह अंतिम इसलिए भी है की क्यूंकि मैंने अपने जीवन में इस दानवी परंपरा का अंत करने की सोच लिया है. जब यह सीरीज लिखी जा रही थी तो चौथे अंक के बाद बिहार के मुख्यमंत्री ने सार्वजनिक तौर पर एलान किया कि दहेज़ का अंत होना चाहिए. हर सरकारी दफ्तरों में दहेज़ के खिलाफ लड़ने के लिए शपथ ली जा रही थी. एक संघर्षशील व्यक्ति सबसे ज्यादा आशावादी होता है. मुझे उम्मीद है कि यह समाज एक दिन, अपने बीच कैंसर की तरह फ़ैल रहे इस बीमारी को जड़मूल नाश करेगा. बहरहाल, इस राक्षसी नियम को परम्परा के नाम पर यह समाज ज्यादा दिन तक ढो नहीं सकता. समाज तो गतिशील होता है और जिस समाज में जड़ता आ जाये वो ज्यादा दिन तक समाज भी नहीं रह जाता. भारतीय समाज ने इतिहास में ऐसी कई दानवी परम्पराओं को खत्म कर अपनी गतिशीलता का परिचय दिया है. भारत एक गतिशील समाज है शायद यही वजह है की यह सदियों से भारत बना हुआ है.

मैं खुद बिहार से हूँ इसलिए बिहार को पृष्ठभूमि के तौर पर रखता हूँ अन्यथा दहेज़ की समस्या राष्ट्रिय और विदेशों में रह रहे भारतियों के बीच होने से अंतराष्ट्रीय भी हो जाता है. इसके पक्ष में, तमाम तरह के दकियानुस तर्क गढ़ दिए जा सकते हैं लेकिन इससे कोई कैसे भाग सकता है दहेज़ ने हमें अमानवीय बना दिया है. किसी लड़की की शादी में उसके माँ-बाप के चेहरे पर जो मुस्कान देखकर हम मान बैठते हैं कि वो सब खुश है, असल में उस मुस्कराहट के पीछे सब कुछ ख़त्म हो जाने का दर्द होता है. हम सब जिस शादी में जाकर खूब नाच गाना कर रहे होते हैं, खुश हो रहे होते हैं वो असल में किसी की शादी का जश्न नहीं बल्कि उसी शादी में किसी की बर्बादी मातम भी मनाया जा रहा होता है. हम सब इस समस्या के भुक्तभोगी हैं और दहेज़ रुपी भक्षक का अगला निवाला बनने जा रहे होते हैं. फिर भी हम नाच रहे हैं, दो पीस मीट कम मिलने पर हंगामा भी खड़ा कर देते हैं. बारात वापस कर लेने की धमकी भी दे देते हैं. अगर हम समाज हैं तो हम समाज की तरह व्यवहार क्यूँ नहीं करते?

जब लड़की और उसके परिवार वाले विदाई समय रो रहे होते हैं तो वो रोना हमारे जैसे लूटेरे के यहाँ मजबूर होकर जाने के लिए होता हैं. शादी दो व्यक्तियों के बीच सम्बन्ध नहीं रह गया बल्कि लूटेरा और लूट जाने वालों के बीच का सम्बन्ध बन कर रह गया है. दहेज़ लेकर हम अपना घर बना लेते हैं, वाहन खरीद लेते हैं, पटाखे जला लेते हैं, प्रीतिभोज कर लेते हैं और लड़कीवाले का, बाहर से रंग-रोगन किया हुआ घर, अन्दर से खोखला हो चूका होता है. ख़ुशी, जश्न से किसी को कोई आपत्ति नहीं हो सकती लेकिन वो ख़ुशी किसी के बरबाद हो जाने की कैसी हो सकती है.

इस सदियों की परंपरा ने अब लड़की वालों को अपनी बरबादी का जश्न मनाने को मजबूर कर दिया है. वो अब, सब ख़ुशी-ख़ुशी करते हैं. समाज के तौर पर हमें सोचना चाहिए कि ये क्या कर दिया हमने? किसी को उसके बर्बाद हो जाने पर, जश्न मनाने को मजबूर कर दिया. हम सब ने एक-एक लोटा पानी डालकर, ये सडा-गन्दा पोखर बनाया है और हम सब मिलकर इसमें हर साल डुबकी लगाकार अपवित्र हो रहे हैं, और ये भी मानिये की इस गंदे पोखर का एक घूंट पानी हम में कोई खुद पीना नहीं चाहता. कई लोग मुझसे कहते हैं, ये आदर्शवादी बाते हैं लेकिन हमें सोचना चाहिए की एक बेहतर, गौरवमयी समाज बिना आदर्शों के कैसे बन सकता है. शादी तो दो आत्माओं का मिलन होता है, और दहेज़ की वजह से कई बार आत्मा तो छोडिये, शरीर तक नहीं मिल पाते. कितनी लड़कियों को उसके मायके में छोड़ दिया जाता है, जब तक की दहेज़ की पूरी रकम का भुगतान न हो जाए. क्या हम इतने नकारे समाज के नकारे व्यक्ति हो गए हैं जो खुद एक मोटरबाइक न खरीद सकें. क्या हम इतने नकारे हो गए है की हम एक जीवन में खुद का घर न बना सकें. सोचिये अगर हम यह नहीं कर सकते तो देश क्या बनायेंगे. वन्दे मातरम कहने से देश नहीं बन जाता. देश को बड़े प्यार से, त्याग से बनाना पड़ता है.

दहेज़ न लेना कोई त्याग नहीं बल्कि खुद पर भरोसा होने का एहसास है. इस एहसास के बिना, हम  मांस से लिपटा हुआ एक शरीर होते हैं, इंसान नहीं. अगर हम इंसान हैं, और हम जिन्दा हैं तो बस हमें यह कह देना चाहिए की बस! बहुत हो गया. नहीं बनना मुझे मांस में लिपटा हुआ शरीर, नहीं मानना उस परंपरा को जो मुझे मेरे इंसान होने का एहसास भी छीन ले. नहीं फोड़ना पटाखा..नहीं करना नगीना डांस..नहीं करनी एक रंग की २० स्कार्पियो..कह दीजिये इस समाज से कि मुझे बस मेरी आत्मा से मिलना है, मुझे उससे मिलकर पूरा होना है. मुझे आत्मा, संवेदना से भरा हुआ एक आम इन्सान बन जाना है. याद रहे, यही आम इंसान किसी भी समाज के इतिहास को गौरवमयी बनाता है. दहेज़ हमें इस गौरवमयी इतिहास की रचना करने से रोक रहा है. अब यह हमपर निर्भर करता है की हम इस पोखर में डुब जाना चाहते है या फिर गंगा की तरह पवित्र होना चाहते हैं.

डॉ दीपक भास्कर, जेएनयु से पीएचडी हैं और दौलतराम कॉलेज (दिल्ली विश्विद्यालय) में राजनीतिशाश्त्र पढ़ाते हैं.

Nov 24 2017

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