दहेज़ सामाजिक समस्या नहीं बल्कि सामाजिक प्रतिष्ठा का प्रमाण है (दहेज़ डायरी से प्रथम पार्ट-द बेगीनिंग)

 दहेज़(डावरी) हमारे समाज के टूटने की वो पराकाष्ठा है जहाँ आकर सब कुछ ठहर गया है. इससे निजात पाने के लिए तमाम रास्ते भी ढूंढे जा रहे हैं लेकिन कोई पुख्ता रास्ता निकलना अभी बाकि है. मैं बिहार से ताल्लुक रखता हूँ इसलिए उसी की बात कर रहा हूँ हालाँकि इसमें कोई दो राय नहीं कि दहेज़ एक राष्ट्रीय मुद्दा है, शायद अन्तराष्ट्रीय भी हो. बिहार में दहेज़ की समस्या का ऐतिहासिक जड़ खोजना, मेरे लिए मुश्किल है, निस्संदेह! यह नयी समस्या नहीं है. बिहार में, दहेज़ इतना विकराल रूप ले चुका है कि मुख्यमंत्री नितीश कुमार को राज्यवासियों से अनुरोध किया है कि हम दहेज-युक्त शादियों का बहिष्कार करें. इसके बावजूद बिहार में दहेज़ का व्यवसाय तेजी से फल-फूल रहा है. दुसरे व्यवसायों में कई बार उतार-चढाव देखने को मिल सकता है लेकिन दहेज़ के व्यवसाय में गिरावट का कोई रिस्क कतई नहीं है.

बिहार में दहेज़ कोई सामजिक समस्या नहीं माना जाता है बल्कि यह सामजिक प्रतिष्ठा का प्रमाण है. दहेज़ की रकम से ही, समाज में आपके स्थान और ओहदे का पता चलता है. मतलब, दहेज़ कम मिला तो आप समाज के निचले पायदान वाले लोग हैं और अधिक मिलने पर आप ऊपरी हिस्से के लोग होंगे. ये एक ऐसा वर्गीकरण है जिसके आधार पर, असल में बीपीएल (गरीबी रेखा से नीचे) और एपील (गरीबी रेखा से ऊपर) के लोगों की गणना होनी चाहिए. भारत में कहीं अगर जाति-व्यवस्था टूट गयी है या फिर जहाँ सभी जाति एकमत हो गए हैं, वो दहेज़ व्यवस्था हीं है.

बिहार में अगर आप दहेज़ के बिना शादी करने की बात करेंगे तो आपको पागलों या बेवकूफों की श्रेणी में रखा जायेगा. लड़की वाले भी आपके इस अतार्किक नैतिक व्यवहार से दुखी हो जाते हैं. उन्हें इस बात का डर होता है कि ये लड़का नैतिकता और आदर्श की बात कर रहा है तो निश्चित तौर पर यह अपनी सरकारी नौकरी में रिश्वत अथवा ब्राइब भी नहीं लेगा. सरकारी नौकरी में अगर कोई रिश्वत नहीं ले तो उससे कलंकित व्यक्ति बिहार में कोई नहीं हो सकता. अगर कोई रिश्वत नहीं ले रहा इसका मतलब वो गलत होते कार्य को रोक देगा, फिर वह अधिकारी निकम्मा साबित हो जाता है क्योंकि वह काम नहीं कर पाता है, सॉरी गलत काम नहीं कर पाता है. रिश्वत नहीं लेने का मतलब साफ है की ये हमारी लड़की को एक सफल दांपत्य जीवन देने में असफल हो जायेगा. इसलिए भी, लड़की पक्ष बिना दहेज़ के शादी करने वाले आदर्शवादी लड़कों के यहाँ उस सिद्दत के साथ एप्रोच नहीं करते जितना की दहेज़ मांगने वालों के यहाँ करते हैं.

दहेज़ न लेने का आदर्श, आपको समाज में बहिष्कृत भी कर देता है. आपके बारात में आगंतुक की संख्या स्वतः कम हो जाती है. लोग ये मान बैठते हैं कि आपकी शादी में कुछ ख़ास व्यवस्था नहीं होगी. गाड़ियों की संख्या कम होगी जिसकी वजह से उन्हें पिछली वाली सीट पर बैठना पड़ सकता है. लड़की वालों ने व्यवस्था में अगर कोई कमी रक्खी तो बाराती लड़ाई नहीं कर पाएंगे, बारात वापस नहीं कर पाएंगे क्यूंकि लड़का आदर्शवादी है. जो समाज लूटेरा बन चुका हो उसमें आदर्श की बात करना भी, बेमानी है, फर्जीवाडा है, फालतू और दकियनूसी विचार है. सोचिये! बिहार में, अब आदर्श भी दकियानूसी विचार हो गया है. हम कितना प्रक्टिकल समाज बन गए हैं. हमने यथार्थ से सीधा सम्बन्ध बना लिया है.

बिहार में, समय के साथ दहेज़ के नए तर्क गढ़ दिए जाते हैं. हम कितना परिवर्तनशील समाज है. अब वहां दहेज़ माँगा नहीं जाता बल्कि लड़की वाले अपनी स्वेच्छा से देते हैं. हाँ ये और बात है कि ये “स्वेच्छा” लड़के वाले की हैसियत के अनुसार निर्धारित होता है. लड़के वाले दहेज़ न मांगकर दहेज़ से मुक्त हो जाते हैं, चिल्लाते फिरते हैं, मूंछे तरेरते रहते हैं. बहरहाल, न मांगने से, और भी अधिक मिलने की सम्भावना बढ़ जाती है. मैंने कई बार लड़की पक्ष को दहेज़ न मांगने वाले, वर पक्ष से आग्रह करते देखा है की वो दहेज़ की रकम निश्चित कर दें. इससे लड़की पक्ष ज्यादा सहज महसुस करते हैं. आजकल लड़के पक्ष के डिमांड में लड़की का पढ़ा लिखा या फिर नौकरी में होना भी शामिल हो गया है. इससे लड़की का पिता या माता होना, ज्यादा महंगा सौदा हो गया है. सोचिये हम किधर जा रहे हैं. यह वही बिहार है जिसका एक सुन्दरतम अतीत है. महात्मा बुद्ध ने कहा था कि “लो मैं रुक गया तुम कब रुकेगो”. हम कब रुकेंगे”. दहेज़ डायरी के अगला पार्ट कुछ दिनों में.

डॉ. दीपक भास्कर, दिल्ली विश्विद्यालय के दौलतराम कॉलेज में राजनीति विभाग में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं.

May 13 2017


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