बाहुबली और महिस्मती भारत की कल्पना नहीं है.

 बाहुबली, इस देश की सबसे बड़ी फिल्म है. बाहुबली को मिलने वाला प्यार, कतई अस्वाभाविक नहीं है. कई लोग इसे मोदी जी की, कल्पना का भारत मान रहे हैं. यह मोदी जी के दौर की फिल्म है. मोदी जी, भारत को महिस्मती साम्राज्य जैसा बनाना चाहते हैं. अगर ऐसा है तो अब इस दौर की फ़िल्में, कल्पना से भी परे, परिकल्पना में जाने लगे हैं.ये सच है कि कल्पना का यह ऐसा दौर है, जिसमें सच कहीं नहीं, वास्तविकता से कोई लेना-देना नहीं है. सब कुछ कल्पना में ही हो रहा है. एक ‘नया भारत’ भी कल्पना है. जो फिल्में हमें सच दिखाती हैं वो इस देश में कभी बड़ी फिल्म नहीं बन पाती हैं. हाँ! ये अलग बात है की अब उन फिल्मों को भी सराहा जाने लगा है. अगर यह मोदी के दौर का फिल्म है और यह मोदी के कल्पना का चित्र है तो इससे छोटी फिल्म इस देश कभी नहीं बनी. फिल्में समाज का आइना होती हैं, समाज में क्रांतिकारी सोच और परिवर्तन का जरिया होती हैं. अगर ये फिल्म मोदी के दौर की फिल्म है तो हर साल दो करोड़ नौकरियां, सबके खाते में पंद्रह लाख रूपये, कश्मीर की समस्या का निदान, राम मंदिर बन जाना और भी हजार बातें मात्र कल्पना ही हैं. अगर ये मोदी के दौर की फिल्म है तो निश्चित तौर पर हम राजतन्त्र को बेहतर शासन व्यवस्था मान रहे हैं. जिसमें एक राजा का ‘वचन ही शासन हैं’. संविधान कहीं नहीं हैं और अगर है भी तो वो कौन से संविधान-सभा के गठन से बना है? फिर हम अपने संविधान का क्या करेंगे? हम इस जनतंत्र का क्या करेंगे? कल्पना करना अच्छी बात है लेकिन एक शासक सिर्फ कल्पना मात्र नहीं करता बल्कि कल्पना को मूर्त रूप देने के लिए जमीनी कार्य करता है. फिल्म महिस्मती को आदर्श राज्य की तरह पेश करता है. आदर्श राज्य की कल्पना भी बहुत सतही है. वो कैसा आदर्श राज्य होगा जिसमें मानव एक दुसरे के बराबर नहीं होगा. जहाँ किले की सुरक्षा के लिए बड़े-बड़े दीवार होंगे और आम जनता किसी भी तरह से सुरक्षित नहीं होगी. वो राजा कैसा होगा जो सिर्फ लोगों को प्रेम और भावना से उद्वेलित करता रहेगा. हमारे शासक भी भावनाओं का खेल खेलते हैं जिसमें हमारा दर्द देखने और महसुस करने की बात तो है लेकिन उसका निवारण सिर्फ कल्पना में होता है. फिल्म बाहुबली, असल में रील और रियल जिंदगी में फर्क करती है. फिल्म में उपयोग हुए एक्स्ट्रा इफेक्ट्स, सच पर पर्दा डाल देते है और सब कुछ कल्पना के दौर में चला जाता है. फिल्म हम सबको पसंद है क्योंकि उड़ने की कल्पना मात्र से ही रोमांचित हो जाना भी तो मानवीय संवेदना है.

बहरहाल, फिल्म में भारत के स्वर्णिम इतिहास की भी कल्पना ही है. ऐसा था या ऐसा हो सकता है, इसमें भी विरोधाभास है. वो इसलिए कि, जहाँ एक तरफ ‘देवसेना और शिवगामी’ का महिमामंडन हो रहा है, वही दूसरी तरफ शिवगामी, बाहुबली के लिए पाटलिपुत्र से आये हुए रिश्ते को, उसकी बाह्य सुन्दरता के आधार पर ठुकरा देती है. अगर यह भारत का स्वर्णिम दौर है तो अवश्य ही हम रंगभेद और बाह्य सुन्दरता को तवज्जो नहीं देते होंगे. शिवगामी खुद ही राजनीति में परिपूर्ण और परिपक्व नजर आती है लेकिन वो बार-बार किसी पुरुष को राजा घोषित करती रहती हैं. सिर्फ पुरुष की सत्ता का समाज, स्वर्णिम तो कतई नहीं हो सकता. फिल्म वर्ण-व्यवस्था को सही साबित करता नजर आता है. एक तरफ क्षत्रिय धर्म का पालन हो रहा है तो दूसरी तरफ निचे वर्णों के लोगों के बारे में कुछ कहा नहीं जा रहा. ये सच है की बाहुबली जाति के आधार पर शोषण करते नजर नहीं आते हैं लेकिन जातिवाद तो तब भी है. मोदी का दौर भी यही है, सब जाति के खिलाफ बोल तो रहे हैं लेकिन सहारनपूर उत्तरप्रदेश में जातीय हिंसा में ऊँची जाति के लोगों द्वारा नीची जाति का गाँव जला दिया जाता हैं. ये भी सच है कि हमारी कल्पना इससे कहीं अलग है. फिल्म जिस राजतन्त्र की गौरवगाथा है, उससे पीड़ित होकर ही हमने जनतंत्र का रास्ता चुना है.

भारत में हर दौर में कल्पनाओं के परे, समाज के सच पर फ़िल्में बनी है जिसने सत्ता वर्ग को सकते में ला दिया है. मदर इंडिया, नया दौर जैसी फिल्मों ने राष्ट्र को कल्पना से निकलकर सत्य का सामना करने के लिए बाध्य किया है. अगर हम महिस्मती जैसा सब कुछ चाहते हैं तो हम मान लें की हम सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक बराबरी को कल्पना में भी नहीं आने देना चाहते है. यह अगर मोदी जी के दौर की फिल्म है और यह मोदी जी की भी कल्पना है तो हम निश्चित रूप से इसकी कल्पना भी नहीं कर सकते. बाकि अच्छी फिल्म है, मनोरंजन है, इसे सिर्फ उसी तरह देखा जाना चाहिए न की आदर्श राज्य की तरह. बहरहाल, मोदी जनतंत्र के मूल्य की वजह से प्रधानमंत्री हैं, राजतन्त्र के किसी बाहुबली होने की वजह से नहीं.

दीपक भास्कर, दिल्ली विश्वविद्यालय में राजनीति के प्रख्याता हैं.

May 10 2017

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