मैं कभी इमानदार बन जाऊंगा.

 “मैं” बहुत महत्वपूर्ण है, यह भी मैंने अपने देश के प्रधानमन्त्री से ही सीखा है जब लाल किले के प्राचीर से, देश के नाम अपने सन्देश में बहुत बार उन्होंने “मैं” पर केन्द्रित किया. तो मुझे लगा की “मैं” बहुत महत्वपूर्ण है सो अपने देशवासियों से भी “मैं”; “मैं” होकर हीं संबोधित कर रहा हूँ. अब मेरे ‘प्यारे देशवासी’ यह सोच रहे होंगे की मेरे ‘प्रधानमंत्री’ के सिवा अब ये “मैं” कौन हूँ? “मैं” इस देश का वो “मैं” हूँ जिसके पास पैन कार्ड, पासपोर्ट नहीं है बल्कि आधार कार्ड और वोटर कार्ड है. ये वोटर कार्ड मुझे एक दिन के लिए “मैं” बना देता है. मैं पहले सोचता था की अब कोई भी ‘मैं’ नहीं है बल्कि ‘हम भारत के लोग’ हैं. वैसे, “हम भारत के लोग” में कई “मैं” होते हैं, उसी कई “मैं” में से, एक “मैं”, मैं भी हूँ. लेकिन ये बात भी मुझे समझ में आती है कि किसी एक “मैं” में “हम भारत के लोग” नहीं हो सकते हैं. मैं परेशान रहता हूँ की आपके वाले “मैं” में, मुझे मेरा वाला “मैं” क्यूँ नहीं दिखता है. खैर, मैं पढ़ा लिखा नहीं हूँ लेकिन इतना जानता हूँ की मेरे देश के संविधान में “हम भारत के लोग” हैं तो आप इतनी आसानी से “मैं” कैसे हो जाते हैं.

बहरहाल, मैं वापस अपने गाँव जा रहा हूँ. अभी-अभी आपके भाषण ने हमारी जिंदगी में तूफ़ान मचा दिया है. आपके भाषण ने ५०० सौ और १००० के नोट को प्रतिबंधित कर दिया है. मेरे पास ऐसी कोई रकम नहीं जिसे लेकर ‘मैं’ बैंक जाऊं, और उसे बदल लूँ. मेरे पास कुछ पैसे होते हैं, जिनको मैं हर वक्त रखता हूँ जिससे मैं आपात स्थिति में अपने गाँव जाने का किराया भर सकूँ. पिछले तीन दिन से मैं बिना काम के हूँ और अब बस घर जाने भर का किराया है, सो घर जा रहा हूँ, मेरे बच्चे, बीबी, माँ-बाप सब शायद भूखे हीं होंगे क्योंकि मैं ही हूँ जो उनके लिए खाना ला सकता हूँ. लेकिन ये तब हो सकता है जब मुझे रोज काम मिले लेकिन फिलहाल मुझे किसी भी तरह के काम मिलने की कोई संभावना नहीं है. मैं अपने भूखे बच्चों को क्या समझाऊंगा की मैं उसे खाना क्यूँ लाकर नहीं दे पा रहा हूँ? क्या मैं उसे यह कह दूँ उसका पिता उसे देश के लिए भूखा रख रहा है. तब मेरे मन में भी, यह सवाल लाजिमी है की, क्या इस देश के लिए लड़ाई में प्रधानमंत्री, मंत्री, और तमाम वो लोग जो कालाधन रखे हैं, भूखे रह रहे हैं? काले धन के खिलाफ इस लड़ाई में, मैं और मेरे बच्चों ने सबसे ज्यादा बलिदान दिया है. लेकिन क्या देश के खजाने में जब इतने पैसे आ जायेंगे तो मेरी जिंदगी अच्छी हो जाएगी? शायद नहीं? क्यूंकि ये सारे पैसे उन लोगों को ऋण के तौर पर दे दिए जायेंगे जो गबन कर विदेश भाग जायेंगे.

मैं अपने गाँव जाने वाली ट्रेन में बाथरूम के पास बैठ चूका हूँ. टिकेट लिया है, लेकिन हमारे जैसे लोगों को टिकट के बावजूद, बौगी में कभी जगह नहीं मिलती. मैं हर समय यहीं सफ़र करता हूँ. खैर! मुझे उतनी शिकायत की आदत नहीं. शायद! भगवान् ने हमारी तकदीर ऐसी ही लिखी है. बहरहाल! बाथरूम के पास बैठकर आपके भाषण को सोच रहा हूँ. आपने मुझे इमानदार कहा था. सही है! मैं इमानदार हूँ. मेरी ईमानदारी हीं मेरे देशभक्त होने का प्रमाण भी है. लेकिन अब इस देश में, जो इमानदार नहीं है वो इमानदार हो सकते हैं. मैंने सोचा था की जिनके पास कालाधन है वो जेल जायेंगे, उन्हें कड़ी से कड़ी सजा मिलेगी और उनपर देशद्रोह का मुक़दमा चलेगा. मेरी बदतर जिंदगी के गुनाहगारों से हिसाब लिया जायेगा. लेकिन पता चला की सजा नहीं है, बल्कि वो काले-धन को सफ़ेद कर सकते हैं. अच्छा है! पहले खूब काला धन जमा करो और फिर एक दिन उसे सफ़ेद करा लो. लेकिन इस धन को जमा करने के कारण मेरी जिंदगी के सालों-साल, जो काले पन्ने में तब्दील हो गए उनका क्या? क्या उन्हें कोई सफ़ेद कर सकता है? मेरी प्यारी सी बेटी ने, आप हीं के बिना सुविधा वाली सरकारी अस्पताल में दम तोड़ दिया, उसकी सजा किसे देंगे? क्या उसकी जिम्मेदारी ये कालेधन वाले नहीं लेंगे और आप उसको सजा नहीं देंगे? अब मैंने सोच लिया है की मैं इमानदार नहीं रहूँगा, ये भार मैं अपने कंधे पर क्यूँ लेकर चलूँ, जब मैं डकैती कर भी इमानदार की लिस्ट में आ सकता हूँ. सिर्फ ये बताकर की मेरे पास कालाधन है और आप उससे टैक्स ले लेंगे, वो पेनाल्टी भर देगा, बस हो गया इमानदार. मुझे अब लगने लगा है की आप भी मुझे सबकी तरह मुर्ख बना रहे हैं. मुझे अपने ऊपर घिन आने लगी है की मैं पिछले सत्तर सालों से मुर्ख बनता आ रहा हूँ. लेकिन आपने मुझे अब रास्ता दिखा दिया है और अब मैं इमानदार नहीं रहूँगा. बल्कि जीवन भर काले-कारनामे के बाद एक दिन इमानदार बन जाऊंगा.

टी टी साब चेक करने आ गए हैं, एक आदमी को डांट भी रहे हैं जो जनरल का टिकेट लेकर स्लीपर क्लास में चढ़ गया है, उनको इमानदारी का लेक्चर भी दे रहे हैं. लेकिन फिर तीन सौ रूपये देकर वो आदमी इमानदारी के लिस्ट में आ गया है और उन्हें सीट भी मिल गयी है. तो क्या चेक करने वाले टी टी इमानदार हैं? इनकम टैक्स वाले, कालेधन वालों के यहाँ छापा मारते हैं तो क्या इनकम टैक्स वाले इमानदार हैं? अगर हैं तो महज ५०००० की सैलरी वाले नौकरी से वो करोड़ों का घर कैसे बना लेते हैं? हाँ! अब समझ आया की उनके बच्चे भी हमारे बच्चे की तरह भूखे रहते होंगे. साब ने पेट भर न खाकर अपना घर बनाया होगा. ये इसीलिए कह रहा हूँ क्यूंकि मैंने अपने हाथों से एक इनकम टैक्स के बाबु का घर बनाया था. खैर सफ़ेद कपड़े पहन लेने से भी तो आप सफ़ेद लगते हैं. मैं सफ़ेद कपड़े नहीं पहनता क्यूंकि काले रंग के कपड़े बहुत सारे दाग-धब्बे छुपा लेता है. वो दाग मेरे नहीं है बल्कि दूसरों के हैं जिनके लिए ‘दाग अच्छे हैं’ का प्रचार आता है.

खैर! मैं जा रहा हूँ उन तमाम “मैं” को खोजने जिनके होने से “हम भारत के लोग” बने हैं. मैं एक-एक कर, हर “मैं” से बात करूँगा और उनको लेकर दिल्ली आऊंगा. लाल किला के ऊपर से आप उतरेंगे और नीचे सुनने वालों की कतार में बैठेंगे. और वो हर “मैं” लाल किला पर चढ़कर, आपको अपना दर्द बताएगा. आप रोइयेगा मत क्यूंकि आपके आँसू में मुझे अपना दर्द बिलकुल नजर नहीं आता है.

दीपक भास्कर, दिल्ली विश्विद्यालय के दौलत राम कॉलेज में राजनीती विज्ञान विभाग में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं.

बिहार के अररिया जिले के डीएम हिमांशु शर्मा बने “करप्सन क्रूसेडर”

उत्तर बिहार का एक जिला “अररिया” वो जिला है, जो इस देश के अत्यंत गरीब जिलों में से एक है. सीमांचल में स्थित यह जिला, हालाँकि देश के लिए बहुत हीं महत्वपूर्ण जिला है क्यूंकि इस जिले की उत्तरी सीमा नेपाल के साथ अन्तराष्ट्रीय सीमा साझा करती है. नेपाल का दूसरा बड़ा शहर ‘विराटनगर’ महज ६ किलोमीटर पर है. परन्तु गरीबी और अशिक्षा के कारण यह जिला, हमेशा से राज्य सरकार की अनदेखी का शिकार रहा है. १९९० के दशक में बना यह जिला नेताओं और बिचौलियों के लिए अंडे देने वाली मुर्गी जैसा हो गया है. इस जिले के लोग यह मान चुके हैं की करप्सन नेताओं और अधिकारियों का संवैधानिक अधिकार है और इससे निजात पाना संभव हीं नहीं है. लेकिन अब जिले के लोगों में उम्मीद की किरण फिर से दमक उठी है. ऐसा हुआ है, अररिया जिले के नए डीएम हिमांशु शर्मा की वजह से.

अररिया जिले के डीएम हिमांशु शर्मा ने, शिक्षा क्षेत्र में फैले करप्सन के खिलाफ एक जबरदस्त मुहीम छेड़ दिया है. स्कूल के हेड मास्टर से लेकर शिक्षक तक को जेल भेजने का पूरा खांका तैयार कर लिया गया है. अभी तक इन्होंने जनता के करीब छह करोड़ रूपये, शिक्षकों से वापस लेकर, सरकार के खजाने में भेज दिया है. जेएनयु नई दिल्ली के पूर्व छात्र रहे हिमांशु शर्मा एक किसान परिवार से हैं और उनका कहना है की शिक्षा में फैले कदाचार को ख़त्म करना हीं, उनकी प्रथम प्राथमिकता है. वो ये भी कहते है की शिक्षा एक “मेरिट गुड्स” है और शिक्षित होने से हीं इस जिले में फैली गरीबी भी कम होगी और लोगों का असली सशक्तिकरण भी होगा. सर्व शिक्षा अभियान के तहत चल रहे पोशाक वितरण एवं मद्ध्यान भोजन और बिहार सरकार के द्वारा चलाये जा रहे छात्रवृति में बहुत बड़े घोटाले का पर्दाफाश डीएम हिमांशु शर्मा ने किया है. स्कूल के शिक्षक ने एक ही बच्चे का नाम कई क्लास में पंजीकृत कर रखा था. छात्रों को एक क्लास का स्कालरशिप देकर बाकि क्लास के फर्जी नाम का स्कॉलरशिप, शिक्षक गटक जाते थे. इस घोटाले में शिक्षक से लेकर हेडमास्टर एवं जिला शिक्षा पदाधिकारी तक सम्मिलित हैं. डीएम हिमांशु शर्मा ने वर्ष २०१५-१६ के सभी स्कूलों का रिकॉर्ड चेक करवाया है और इसमें बड़ी गड़बड़ियाँ पाने पर त्वरित कारवाई भी की है. कार्यवाई में इन्होंने रूपये की रिकवरी पर विशेष ध्यान दिया है. इन्होंने रेवेन्यु की रिकवरी के बाद, तुरंत पुलिस कार्यवाही का आदेश दिया है. इन्होंने पिछले कई सालों का रिकॉर्ड मंगवाया है जिससे कई सौ करोड़ की रिकवरी होने की सम्भावना है. गौरतलब है, सैकड़ों की संख्या में शिक्षक अधिकारी जेल जाने वाले हैं. ख़ूबसूरत बात यह है की, रूपये वापस लिया जा रहें है. कई शिक्षक पर पैसे न जमा करने की स्थिति में कुर्की-जब्ती का भी आदेश देने की सम्भावना है. शिक्षक-अधिकारियों में खौफ का माहौल है. जनता में, डीएम साहब की इस कार्यवाई से ख़ुशी की लहर है. कई लोग यह मानते हैं की डीएम हिमांशु शर्मा ने जनता और प्रशासन के बीच दूरी भी कम कर दी है. लोग अपनी शिकायत सीधे डीएम से कर पाते हैं. ये आमजन से मिलते हैं, उनको सुनते हैं और तुरंत कार्यवाई करते हैं. बेहतरीन बात यह है की ये हर काम का ‘फालो-अप’ भी, खुद करते हैं. डीएम साहब को देर शाम के सात-आठ बजे तक ऑफिस में पाया जाता है. इनके आने के बाद, सारे विभाग कार्यरत हो चुके हैं. जहाँ गरीब लोगों को कभी भी चिकिस्ता के लिए सरकारी मदद नहीं मिल पाती थी, वहीँ इनके कार्यकाल में सैकड़ों लोगों को सरकारी लाभ मिल चुका है. डीएम साब का कहना है की बिहार के सबसे गरीब जिलों में से एक अररिया जिला, के आय को बढ़ाने के लिए अधिक से अधिक इंडस्ट्री/उद्योग लगाने की जरूरत है, जिस पर वो लगातार काम कर रहे हैं. कुछ उद्योग जो विवादों के कारण बंद हो चुके थे, उन्हें फिर से खुलवाया गया है, स्थानीय लोगों को नौकरियां देने के लिए भी उद्योग मालिकों से कहा गया है. लघु उद्योगों में गोशालाओं के निर्माण के लिए सरकारी मदद की जा रही है. खुद विज्ञान के विद्यार्थी रहे, हिमांशु शर्मा का मानना है की समाज की नींव वैज्ञानिक सोच के आधार पर होनी चाहिए जिसके लिए वो विभिन्न जगहों पर अवेयरनेस प्रोग्राम चला रहे हैं. बिचौलियों में डीएम का डर व्याप्त है, अधिकारी भी सचेत हो गए हैं. फर्जी नेताओं की रात की नींद उड़ गयी है और भ्रष्ट अधिकारी और शिक्षक, तमाम षड्यंत्र में लगे हुए हैं. डीएम हिमांशु शर्मा समाज के निचले वर्गों के उत्थान के लिए अपनी विशेष प्रतिबद्धता दिखा रहे हैं. सरकारी स्कूलों पर कसती नकेल ने शिक्षा की गुणवत्ता पर भी असर दिखाया है. डीएम स्कूलों का लगातार दौरा कर रहे हैं, जिनसे शिक्षकों की उपस्थति भी बढ़ गयी है. डीएम हिमांशु शर्मा की, इस मुहीम ने राज्य स्तर पर शिक्षा विभाग को एक बार फिर से सकते में ला दिया है. बिहार सरकार के लिए, शिक्षा में हो रहे गबन और घोटालों को रोकना सबसे महत्वपूर्ण है. शिक्षा को चुस्त दुरुस्त किये बिना, बिहार का विकास संभव नहीं है. अररिया जिला में डीएम हिमांशु शर्मा के इस तेवर की सराहना करते लोग थकते नहीं हैं. लोग इन्हें “करप्सन क्रूसेडर” कहने लगे हैं.

दीपक भास्कर, जेएनयु के अंतर्राष्ट्रीय अध्ययन संसथान से पीएचडी हैं और दिल्ली विश्वविद्यालय के दौलत राम कॉलेज में राजनीती के व्याख्याता हैं.

Nov 22 2016

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