विस्थापन का दर्द सिर्फ कश्मीरी पंडितों ने नहीं, औरों ने भी झेला है.

  विस्थापन भारत की ही नहीं बल्कि एक वैश्विक समस्या है. एक रिपोर्ट के अनुसार विश्व के ५२ देशों में २५ मिलियन लोगों का विस्थापन हुआ है. भारत में ६००००० लाख अभी तक विस्थापन का दंश झेल चुके हैं. जिसमें अकेले कश्मीर से २ लाख लोग विस्थापित हुए हैं. कश्मीर भारत का वो अभिन्न अंग है जहाँ पर बर्फ-बारी से लेकर गोली-बारी तक का असर देश के अन्य क्षेत्रों पर बहुत गहरे तौर पर पड़ता है. कश्मीर में हुए या हो रहे किसी भी घटना को भारत के नागरिक अन्यथा नहीं लेते बल्कि उसपर उनकी कड़ी नजर और पैने विचार भी रखते हैं. उन्हीं हजारों मुद्दों में एक मुद्दा, कश्मीरी पंडितों के विस्थापन का भी है और भारतीय राजनीति को इसने काफी हद तक प्रभावित भी किया है. जगह-जगह, इस विस्थापन पर सेमिनार, कांफ्रेंस, पब्लिक मीटिंग्स हुए हैं या फिर होते-हीं रहते हैं. इनके पुनर्वास के लिए बिभिन्न राजनैतिक दलों के पास अपने-अपने मॉडल भी हैं. बहरहाल, उनका पुनर्वास होना चाहिए और सिर्फ बात हीं नहीं बल्कि इस दिशां में त्वरित गति से काम भी होना चाहिए. लेकिन जब सिर्फ कश्मीरी पंडितों के विस्थापन पर इतना ज्यादा हंगामा किया जाता है, बाकि विस्थापितों को उनकी नियति पर छोड़ दिया जाता है तब यह सोचना जरूरी हो जाता है कि कश्मीरी पंडितों का पुनर्वास का नहीं बल्कि राजनीति का मुद्दा है. विस्थापन के कई कारण बताये जाते हैं. कश्मीर से विस्थापन वहां फ़ैल रहे आतंकवाद/अतिधर्मवाद/साम्प्रदायिकता का नतीजा था. तो क्या जब इन कारणों से विस्थापन होंगे तभी यह राष्ट्रिय बहस का मुद्दा होगा अन्यथा?

विस्थापित कश्मीरी पंडित भारत के बिभिन्न हिस्सों में बसे हुए हैं. घर-बार उजड़ जाने का दर्द है और उसके साथ सिर्फ सहानुभूति नहीं बल्कि सरोकार भी है. लेकिन उनलोगों से हमारा सरोकार क्यों नहीं  जिनके घर किसी आतंकवादी ने नहीं बल्कि उन्हीं के द्वारा चुनी हुई सरकार ने उजाड़ दिए. विकास के नाम पर हो रहे अन्याय में लाखों लोग बेघर हो गए, हजारों गाँव जलमग्न हो गए, कितने पहाड़ गड्ढे बन गए, कितनी औरतें निवस्त्र हो गयी, कितने बच्चे अनाथ हो गए. जब उनके घर के नीचे जमें अलुमुनियम, लोहे और हजारों तरह के खादान, उनके घर उजाड़ कर निकाले जा रहे थे तब इस देश में कोई बहस नहीं हो रही थी. तब शहर को मेट्रो रेल चाहिए था और एलइडी बल्ब की रौशनी से सराबोर सड़कें चाहिए थीं. जब देश की सरकार हीं लोगों के घर बसाने के बजाय उनका घर उजाड़ने लगे तो वह देश कहाँ रह जाता है. राष्ट्र की उन्नति और सुरक्षा के लिए इन्हीं की बलि दी जानी थी, सो दी गयी. जब उत्तर-पूर्वी राज्यों में हाहाकार मचा हुआ था, हजारों लोग विस्थापित हो रहे थे, जब वो लोग अपने ही देश के बंदूकों का शिकार हो रहे थे, तब हम चुप थे. जब ओडिशा, झारखंड, छतीसगढ़, मध्यप्रदेश, आंध्र प्रदेश में नए इंडस्ट्री के लगाने के नाम पर उनकी जमीनें, अचानक राष्ट्रिय संपत्ति घोषित कर दी जा रही थी तब हम चुप थे. जब हमारे घरों में बिजली की आपूर्ति के लिए सरदार सरोवर बांध की ऊँचाई बढ़ायी जा रही थी और हजारों गाँव जलमग्न हो रहे थे तब हम क्रिकेट का अनालिसिस कर रहे थे. जब बिहार, उत्तर प्रदेश, बंगाल जैसे राज्यों से भूमिहीन मजदूर परिवारों को लेकर पलायन कर रहे थे तब भी हम सब चुप थे. जब ये लोग वहां से निकले तो इन्हीं के हाथों और साधनों से बने शहर ने इन्हें गंदे नाले के बांध पर, जुग्गी –झोपड़ियों में धकेल दिया. तब भी हम इनके नियति को ही दोषी मानते थे, सरकार की नीतियाँ तो हमारे पक्ष में ही थी.

कश्मीरी पंडित गोली से भी मरे थे लेकिन इस देश के गरीब, पिछड़े, आदिवासी, भूख से मरे हैं. वो आतंकवादियों के, दंगाईयों के गोली से मरे थे तो यहाँ लोग अपने सरकार की नीतियों का शिकार हुए थे. शहर में रहने वाली सरकार ने गाँव को कितना पीछे छोड़ दिया था. कश्मीरी पंडितों के लिए तो हमने आतंकवाद को कारण मानते हुए, पाकिस्तान को जमकर कोसा. लेकिन बाकि चार लाख लोगों के लिए किसको कोसेंगे? क्या भारत सरकार को कोसना नहीं चाहिए? क्या हमें यह नहीं सोचना चाहिए कि गुजरात दंगों के बाद वहां से हजारों परिवार विस्थापित हुए, मुज्जफरनगर दंगे के बाद आज भी लोग वापस वहां जाने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे हैं. असाम, मालदा(बंगाल) से विस्थापन, इसके लिए किस पाकिस्तान को जिम्मेदार मानेंगे हम? विस्थापित लोग हमारे शहर के फ्लाईओवर के निचे रहने लगे और हम उन्हें हमारे शहर को गन्दा करने के नाम पर यहाँ से वहां भेजते रहे. पुनर्वास के नाम पर कागज के घर मिले जो जमीन पर थे ही नहीं. मेधा पाटेकर ने शहर-शहर घूमकर इन गाँव को बचाने की गुहार लगाई, लेकिन हम अपनी सहूलियत के लिए हमारी मेहनत और उनकी बद्जिंदगी के लिए उसकी नियति को दोषी मानते रहे. सरकार हमारी थी इसिलए हर छह महीने पर वेतन बढ़ते रहे और मजदूर हमारे नैतिकता पर आश्रित थे.

बहरहाल, विस्थापन सिर्फ कश्मीर से नहीं हुआ है बल्कि इस देश के हर कोने से हुआ है, हर गाँव से हुआ है. कारण बस अलग-अलग रहे हैं. कहीं पाकिस्तान की नीतियाँ तो कहीं भारत की. भारत सरकार की विकासोनुम्ख नीतियों में अगर देश के हर कोने जुड़े होते तो आज ये संख्या ६ लाख नहीं होती. हदेश के हर नागरिक को, कश्मीरी पंडितों को भी इन चार लाख लोगों के साथ खड़ा होना चाहिए. आखिरकार, दोनों का दर्द भी तो एक हीं हैं.

दीपक भास्कर, जेएनयु से पीएचडी हैं और दिल्ली विश्वविद्यालय के दौलत राम कॉलेज में राजनीति पढ़ाते हैं.

feb 17 2017

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