कश्मीर अब आजाद हो रहा है.

  कश्मीर भारत का वो अभिन्न अंग है जहाँ की गोली-बारी से लेकर बर्फ-बारी तक, भारत की राजनीति के मिजाज को प्रभावित करता रहता है. ९० के दशक के बाद भारत के स्विट्ज़रलैंड को अलगाववाद और आतंकवाद की नजर लग गयी थी. कश्मीर, भारत से आजाद होना चाहता था और वहां आये दिन, अलगाववादी आजादी के नारे बुलंद करते रहते हैं. बहरहाल, कश्मीर आज भी भारत का अभिन्न अंग है लेकिन कश्मीर अब आजाद हो रहा है. जिस आजादी की जरुरत एक समाज को होती है, उस आजादी की मुहीम कश्मीर में सफलतापूर्वक शुरू हो गयी है. कश्मीर को आजादी अशिक्षा, बेरोजगारी, धार्मिक अन्धविश्वास, सामाजिक असमानता से जैसे कलंक से चाहिए थी. इस आजादी की शुरुआत हुई, शाह फैज़ल के सिविल सर्विसेज की परीक्षा में प्रथम स्थान लाने से, सिलसिला चल पड़ा और अख्तर हसन ने इसी परीक्षा में दूसरा स्थान प्राप्त किया. जहाँ अलगाववादी बुरहान वानी जैसे लोगों को, कश्मीरी युवा का आदर्श बना रहे थे वहीँ फैज़ल और अख्तर जैसों ने कश्मीर के युवाओं के आदर्शों को बदल डाला. अब युवा के लिए कोई बुरहान वानी जैसे आतंकवादी या अलगाववादी आदर्श नहीं बल्कि फैज़ल और अख्तर जैसे युवा हैं. हालाँकि, वहां आज भी अलगाववादी इनलोगों को आदर्श के तौर पर नहीं मानते हैं. पर कहीं न कहीं वादी की हवा बदल जरुर रही है.

अभी हाल में दंगल फिल्म की जायरा शेख वसीम (गीता फोगट के बचपन का रोल में) कश्मीर से हैं. कश्मीर के युवा लड़के-लड़कियों के लिए आदर्श बनीं जायरा ने अपने फेसबुक पर अलगाववादियों से माफ़ी माँगा है. उन्होंने इन लोगों से उसे माफ़ करने के लिए अपील भी किया है. किसी भी समाज के लिए जायरा जैसी बच्ची का माफ़ी मांगना उस समाज की जीत तो कतई नहीं हो सकती. जायरा का हार जाना, कश्मीर की हार होगी. जायरा क्यूँ माफ़ी मांगे, माफ़ी तो कश्मीर के अलगाववादियों को मांगनी चाहिए. जायरा ने तो खुद अपने बल पर अपना रास्ता चुना और उसमें सफल भी हुई. जिस दोयम दर्जे को इस विश्व की महिलाएं, हजारों साल से जीते आ रही हैं, जायरा उस हजारों साल के बंधन को तोड़ कर आजाद हुई है. ये आजादी किसी भी जमीन के टुकड़े के आजाद होने से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण है. मानव द्वारा मानव का शोषण से मुक्ति से बड़ी आजादी और क्या हो सकती है. असल में कोई भी समाज जायरा जैसी लड़कियों से डरता है और डरना लाजिमी है. क्यूंकि, जायरा कश्मीर की आजादी के मायने बदल रही है. जायरा जैसे युवा, अब भारत से नहीं बल्कि मानव के द्वारा मानव का शोषण से आजादी चाहते हैं. जायरा, इस नयी आजादी के मुहीम की नायक है. डरना स्वाभाविक है क्योंकि आजादी की राजनीति से जायरा का क्या लेना-देना, इसकी आजादी तो इसके द्वारा चुनी हुई जिंदगी में है. वो फिल्म में तो वो दंगल कर हीं रही थी लेकिन अब वो इस समाज से भी दंगल कर रही है.

उन तमाम हानिकारक बापू से आजादी का दंगल कर रही है, जिन्होंने बेटी के नाम पर, उसके इंसान होने का एहसास छीन लिया है. जायरा वसीम कोई मुसलमान लड़की नहीं बल्कि वो सिमोन बोलिवर की वो औरत है जिसे जिंदगी के हर मोड़ पर किसी मर्द से उसकी अपनी नियति के बारे में पूछना पड़ता है. इसी से तो वो बाहर निकली है. फिर उसे क्यूँ डराया जा रहा है. असल में, जायरा को डराने लोग खुद डरपोक हैं. जायरा, कश्मीर के अलगाववादी हीं क्यों बल्कि बंगलुरु के राम सेना को भी पसंद नहीं आएगी. काश! हम ये समझ पाते कि क्या गलत है अगर कोई खुद का रास्ता चुनना और बनाना चाहता है. अगर जायरा वसीम, मर्द की दुनिया से अलग, अपनी दुनिया बनाना चाहती है तो किसी को क्या समस्या हो सकती है. कश्मीर की असली आजादी तो जायरा के आजाद हो जाने में है. अन्यथा, भूभाग या जमीन के टुकड़े तो सदियों से आजाद हो रहे हैं और उस आजाद जमीन के टुकड़े को जिसे हम मुल्क मान लेते हैं, में भी तो लोग गुलाम हीं महसूस करते हैं.

जायरा वसीम जैसी लड़कियां, कश्मीर की नहीं बल्कि इस मुल्क की आदर्श हैं और होना भी चाहिए. जायरा को माफी नहीं बल्कि इस समाज को उससे माफी मांगनी चाहिए, उसकी आजादी का जश्न मनाना चाहिए. सब को खुश होना चाहिए कि अब भारत में भारतीय आजाद हो रहे हैं, अपनी जिंदगी का रास्ता खुद बना रहे हैं और चुन भी रहे हैं, कश्मीर के लोगों को जायरा वसीम को धन्यवाद कहना चाहिए. उन्हें जश्न मनाना चाहिए क्यूंकि कश्मीर अब असल में आजाद हो रहा है.

दीपक भास्कर, (जवाहरलाल नेहरु यूनिवर्सिटी में शोध छात्र हैं एवं दिल्ली विश्वविद्यालय के दौलत राम कॉलेज में असिस्टेंट प्रोफ़ेसर हैं)

 

संविधान की स्थापना हीं तो न्यायपूर्ण गणतंत्र की स्थापना है

   भारत अपना 68वाँ गणतंत्र मना रहा है. आज हीं के दिन हमने अपना, संविधान अंगीकृत किया था और हम दुनिया के सबसे बड़े प्रजातांत्रिक गणराज्य बने थे . भारत का संविधान, दुनिया के विभिन्न देशों के संविधान से कई मायनों में अलग है. यह संविधान रूल ऑफ़ लॉ को तो मानता हीं है लेकिन इससे ज्यादा रूल ऑफ़ जस्टिस (न्याय) को स्थापित करता है. न्याय की संकल्पना हीं भारत के संविधान के मूल में है. संविधान के लगभग हर अनुच्छेद न्याय की संकल्पना के तरफ इशारा करते हैं. भारत का संविधान ‘सार्वभौमिक मानवीय स्वतंत्रता’ के लिए अपनी प्रतिबद्धता साबित करता है. मानव के द्वारा मानव के शोषण को सिरे से ख़ारिज करता है. भारत को एक राष्ट्र का रूप देने के क्रम में इस बात का ध्यान रखा गया है कि भारत सिर्फ एक भूखंड या जमीन का टुकड़ा भर नहीं बल्कि लोगों का समूह है. १९५० के दशक के दशक के बाद बहुत सारे देश आजाद हुए, लेकिन ये देश आज भी प्रजातंत्र के लिए संघष कर रहे हैं, गणतंत्र की संकल्पना तो अभी कोसो दूर है. १५ अगस्त १९४७ को भारत ब्रितानी शासन से आजाद तो हुआ था परन्तु असली आजादी तो २६ जनवरी १९५० को हीं मिली थी, जब भारत एक प्रजातांत्रिक गणराज्य बना था. भारत के संविधान ने, कई देश, समाज, जाति, धर्म में खंडित राष्ट्र के लोगों “नागरिक” की संज्ञा दी. कितना जरुरी है, इस देश के लोगों को ये मानना की हमारी पहचान सिर्फ एक नागरिक के रूप में होनी चाहिए. भारत को एक धागे में जोड़े रखना सिर्फ और सिर्फ संविधान से संभव है. वरना भारत में हो रही राजनीति का क्या है, उसे राष्ट्र के खंडित या विखंडित होने से क्या फर्क पड़ता है, दोनों हीं क्रम में राजनीतिक सत्ता तो कायम हीं रहती है. बाबा साहेब भीम राव अम्बेडकर ने कहा था कि भारत में सिर्फ संविधान की सत्ता होनी चाहिए, इसकी सत्ता हीं, वर्षों से चली आ रही सामाजिक सत्ता और राजनैतिक सत्ता का विकल्प है. बाबा साहेब ने आगाह किया था कि राजनैतिक प्रजातंत्र से सिर्फ बात नहीं बनेगी बल्कि सामाजिक एवं आर्थिक प्रजातंत्र से हीं राष्ट्र का निर्माण हो पायेगा.

जरा सोचिये, जिस देश में लोग भगवान् के सामने भी बराबर नहीं होते थे, जहाँ समाज के एक बड़े तबके को मंदिर तक जाना वर्जित था, जहाँ दलित, इंसान भी नहीं माने जाते थे, जिनकी परछाई से भी लोग दूषित हो जाते थे, जहाँ दक्षिण में गरीब महिलाओं को ऊपर का बदन खुला हीं रखना पड़ता था, जहाँ आदिवासी सभ्यता के आस-पास भी नहीं थे, ऐसे समय के दौर से निकलकर हमारे संविधान सभा के सदस्यों ने एक ऐसा संविधान बनाया, जहाँ सब एक दुसरे के बराबर हो गए थे. अब किसी को मंदिर के सामने भी जाने की जरुरत नहीं थी, वो बराबर थे संविधान की नजर में.

हालाँकि ६८वें गणतंत्र मनाने के समय भी, “हम भारत के लोग” तमाम तरह की समस्यायों से जूझ रहे हैं. आज भी भारत सामाजिक, राजनैतिक एवं आर्थिक समानता के लिए संघर्ष कर रहा है. लेकिन ये समस्याएं हमें सिर्फ इसलिए झेलनी पड़ रही है क्योंकि हम आज तक अपने संविधान को अक्षरसह लागू नहीं कर पाए हैं. अभी भी संविधान हमारे जीवनशैली का हिस्सा नहीं बन पाया है. अभी भी भारत में आने वाली सरकारें, संविधान की उद्देश्य को अपना उद्देश्य नहीं बना पाए हैं. इस बात में कोई दो राय नहीं की जो भी बदलाव इस देश में हुए हैं वो संविधान की वजह से हीं संभव हुआ है.

यह देश तब आगे बढेगा जब न्याय की स्थापना होगी, जब मानव के द्वारा मानव का शोषण बंद होगा, जब जनता के शासन के नाम पर कुछ हीं लोगों के हाथों में पूरी व्यवस्था नहीं होगी और यह तब संभव होगा जब हम प्रजातांत्रिक गणतंत्र बनेंगे. जब यह देश संविधान के द्वारा शासित होगा क्योंकि न्यायिक दृष्टिकोण तो संविधान से हीं निकलता है. मूल रूप से, संविधान की स्थापना हीं तो न्याय की स्थापना है.

दीपक भास्कर, (जेएनयु से पीएचडी हैं और दिल्ली विश्विद्यालय के दौलत राम कॉलेज में असिस्टेंट प्रोफ़ेसर हैं)

Feb 17 2017

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