सामाजिक समझौते/अनुबंध” के तहत ही तो “राज्य” बना था.
हमारे देश में हर चीज पर कहावतें या मुहावरे मिल जाते हैं. “जिंदगी का नाम ही समझौता है”, ये मुहावरा तो हमें हर दूसरा व्यक्ति सुना जाता है. शायद ये सही भी है, क्युंकि हम हर पल समझौता ही तो कर रहे होते हैं. लेकिन हम शायद, रोज-रोज ये समझौते नही करना चाहते थे इसिलए हम सब ने मिलकर एक बड़ा समझौता किया था. उस समझौते का नाम था “सामाजिक अनुबंध” या “सोशल कौंट्रेक्ट” और इसी समझौते से “राज्य” अथवा “स्टेट” या आम भाषा मे “सरकार” कि उत्पत्ति हुयी थी. “राज्य” को हम सब ने मिलकर असीम शक्तियां दी थी ताकि राज्य हमारी जरूरतों को पूरा करने मे, कभी भी कमजोर ना पड़े. यह तस्वीर जो आप देख रहे हैं, सरकार के ‘होने’ पर सवाल है. उस अनुबंध या समझौते पर सवाल है जो हमने बहुत पहले किया था. ऐसी तस्वीरें आये दिन अखबारों, सोशल मीडिया अथवा न्यूज़ चैनलों पर, हम सब देखते ही रहते हैं. इस तस्वीर मे यह साफ दिखता है कि कैसे लोग अपनी जिंद्गी बसर करने के लिये रोज समझौता कर रहे हैं. तो फिर उस समझौते का क्या जो हम सबने “राज्य” या “सरकार” बनाने के लिये किया था? राजनिती के पिता कहे जाने वाले अरस्तु ने कहा था कि एक व्यक्ति अपनी जरूरतें अकेले पूरा नहीं कर पाता इसलिए वह परिवार का निर्माण करता है, परिवार भी सारी जरूरतें खुद पूरा नहीं कर पाता है और फिर समाज अस्तित्व में आता है, लेकिन समाज भी सब कुछ स्वंय नही कर सकता, इसलिए “राज्य अथवा राष्ट्र” का निर्माण किया जाता है. लेकिन आज राज्य/सरकार हमारी समस्याओं से कितना दूर चला गया है. हमलोग हर समस्या को खुद ही सुलझाने के लिए मजबूर हो गये हैं. हर जगह “देश आगे बढ़ रहा है” के नारे पाट दिये जाते हैं. ये कौन सा देश है जो बिना लोगों के ही आगे बढ़ता जा रहा है. इस देश को यह समझना चाहिये कि लोगो के बिना देश, देश नहीं, बल्कि जमीन का महज एक टुकड़ा भर रह जाता है. ये तस्वीर बिहार के अररिया जिले के “खवासपूर–रमै-तिरस्कुंड-मधुरा” इलाके कि है जहाँ इस तरह के संघर्ष हर साल किये जाते है. उत्तर बिहार के कोशी क्षेत्र मे लगभग सारे जिले सहरसा, मधेपूरा, अररिया, पूर्णियॉ, कटिहार में लोग सदियों से इस तरह कि जिंदगी जी रहे हैं, जहाँ सरकार नही बल्कि भगवान ही सब कुछ है. वहाँ के लोग भले ही सांसद और विधायक चुनकर भेजेते हो लेकिन उम्मीद उन्हें सिर्फ भगवान से होती है. हर तरफ “मेरा देश बदल रहा है” के नारे गूँज रहे हैं लेकिन यहाँ युगों से सब कुछ वैसा ही है, कुछ नहीं बदला और न बदल रहा है. “बिहार मे बहार है” तो फिर ये तस्वीर क्या है? ये कौन सा बिहार है जहाँ बहार है, फिर वो बहार यहाँ पर क्यूँ नहीं है? आप इसे हर बार प्राकृतिक आपदा कह कर टाल देते हैं. सोचिये, जब यहाँ के लोगों का जीवन प्रकृति के नियमों से हीं चलेगा तो सरकार किसलिए बनायी गयी थी. जहाँ देखिये, विकास कि हीं बातें हो रही है, इतना ही नहीं बल्कि “सतत विकास/सस्टेनबल डेवेलपमेंट” पर बल दिया जाता है. मॉडल पर मॉडल दिखाये जा रहे है. ये कौन सा विकास का मॉडल है जिसमे, ये तस्वीर बाहर निकल कर आती है. इस तस्वीर को देखकर आपको विचलित होना चाहिए. आप अगर विचलित नहीं हो रहे तो फिर राष्ट्रवाद का झूठा ढोंग क्यूँ रचा जा रहा है? बिहार, पिछ्ले कई सालों से दस प्रतिशत से भी ज्यादा विकास दर के आगे बढ़ रहा है तो फिर उसका असर यहाँ क्यूँ नहीं दिख रहा है, ये लोग आगे क्यूँ नहीं बढ़ पा रहे हैं? आप इस तस्वीर को गौर से देखिये, इसमें आपको सरकार कहीं भी नहीं दिखेगा. बच्चो के तन पर कपड़े नही है लेकिन हमारा देश तो कपड़े के निर्यातक देशों कि श्रेणी में है ही. यहाँ खाना बनाने के लिये इंधन, गोबर के उपले है ना कि गैस, वो चुल्हा भी मिट्टि से ही बना है. इस तस्वीर मे जो भी जीवन है उसमे सरकार कहाँ है? न घर है, न चूल्हा, ना इंधन, न कपड़े, कुछ भी तो नहीं. इन सब चीजों को पूरा करने के वादों को सुन-सुन कर लोग अब थक चुके हैं. ये वो बच्चे हैं जो कभी स्कूल नही जायेंगे, ये अपनी माँ के साथ रोज जीवन-संघर्ष मे होंगे, लकडियाँ चुनेंगे इंधन के लिए, मजदूरी करेंगे भोजन के लिए. और फिर कौन से स्कूल मे जायेंगे जहाँ शिक्षक के नाम पर ‘शिक्षा मित्र’ होते है. जो शिक्षा के मित्र कम, दुश्मन ज्यादा हो गये है. जो शिक्षक खुद मुसलमान या फिर हिंदू है, ऊची जाति का है या फिर नीची जाति का, वो इन बच्चों को क्या सिखायेंगे. चाणक्य ने कहा था कि जिस समाज का शिक्षक कमजोर हो वो समाज कमजोर हो जाता है और मैं कहता हूँ की शिक्षक अगर “शिक्षा-मित्र” जैसे हों तो समाज खत्म हो जाता है. अगर वह किसी तरह, ये बच्चा कॉलेज भी पहुंच गया तो क्या होगा? वहाँ कॉलेज के शिक्षक कॉलेज मे नहीं, घर पर पढ़ाते हैं. इतिहास के शिक्षक रजनीतिशास्त्र पढ़ाते हैं और भौतिकी के रसायनशास्त्र. सिर्फ इस जगह का यह हाल नही है बल्कि पूरे देश मे वो अनुबंध/समझौता टूट गया है या फिर टूट रहा है. सरकार अगर लोगों कि समस्याओं कि अनदेखी करे तो वो उस समझौते कि भी अनदेखी कर रहा होता है.
आये दिन देश मे लोग सरकार के खिलाफ उठ खड़े होते हैं, कई बार बन्दुक लेकर भी. क्यूँ नक्सल्वाद है ना? राज्य या सरकार उनकी आवाज दबा दे, ना सुने, लेकिन उससे क्या होगा? एक सरकार ने कहा कि “सबके साथ से सबका विकास होगा”, दुसरे ने कहा “न्याय के साथ विकास होगा”, तो क्या ये तस्वीर उस झूठ का गवाह नहीं है? उस “बड़े समझौते” मे कहा गया था कि राष्ट्र या सरकार का मूल काम न्यायपूर्ण समाज का निर्माण करना है, लेकिन ये तस्वीर विभिन्न सरकारों द्वारा किये गये लगातार अन्याय का खुला प्रमाण है. जब सरकार ही अन्याय करने लगे तो लोग क्या करेंगे? आप ही सोचिये की इस देश के एक कोने में ‘इरोम शर्मिला’ सोलह साल से भुख हड़ताल पर बैठी है, लेकिन आजतक किसी भी सरकार ने उससे बात करने कि भी जरुरत नही समझी. बात करना चाहिये था, पूछना चाहिये था, उसके दुःख का कारण जानना चाहिये था. उसकी समस्याओं का समाधान करना राज्य का कर्तव्य था, और फिर यही तो “सामजिक अनुबंध/समझौते” मे निर्णय किया गया था. राज्य सिर्फ भु-खंड नही बल्कि लोगो का समुह होता है. सामाजिक अनुबंध/समझौता लोगों के बीच हुआ था, ना कि जमीन के टुकड़ो के बीच. क्या राज्य सिर्फ जमीन कि परवाह करेगा? क्या राज्य का काम सिर्फ टैक्स उगाही करना है? हॉब्स ने सामाजिक अनुबंध के सिद्धांत मे कहा है कि मनुष्य प्राकृतिक स्थितियों में सुरक्षित नहीं था इसलिए “नवीन शक्तिशाली राज्य” कि स्थापना होना जरूरी था. प्राकृतिक राज्य अथवा स्थिति में मनुष्य बहुत सारी समस्याएँ झेलता थी. वहाँ “संसाधन कि कमी थी”, “लोगों के बीच दुराभाव था”, “गला-काट प्रतियोगिता थी”, “हर व्यक्ति स्वार्थ मे वषीभूत था”. हॉब्स ने इसे “निरंतर युद्ध” वाला राज्य कहा था. लेकिन क्या हम नवीन राज्य मे इन सब समस्याओं से परे हैं? सरकार आँकड़े पर आँकड़े दिखाती है और उन आँकड़ों में तो देश आगे बढ ही रहा होता है लेकिन लोग पीछे छूट रहे होते हैं. हर समितियां गरीबों की संख्या अलग-अलग बताती है. गरीबी का निर्धारण तो कुछ पैमानों के आधार पर कर दिया है. कोई कितनी आसानी से कह जाता है की अगर आप ३२ रूपये रोज कमाते हैं तो आप गरीब नहीं हैं, यह कितना बड़ा मजाक है. सरकार लोगों की जरूरतों को पूरा नहीं कर रही है तो ये सरकार के अस्तित्व पर सवाल है. अगर व्यक्ति हर जरूरतें खुद ही पूरा कर रहा है तो साफ है की वो सामाजिक अनुबंध/समझौता टूट गया है. तस्वीर को फिर से एक बार देखिये, गौर से देखिये, आपको “सामाजिक अनुबंध या समझौता” टूटा हुआ दिखेगा और आपको राज्य के अस्तित्व पर एक बड़ा ख़तरा भी दिखेगा.
दीपक भास्कर
Sept 15 2016
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