मुंबई: एक शहर जिसमें ‘सहर’ नहीं होता.

 मुम्बई देश की आर्थिक राजधानी के तौर पर प्रचलित है. यह शहर अपने कूल मिजाज के लिए जगजाहिर है. वैसे, इस शहर ने बहुत आघात भी झेले हैं. यहाँ, जिंदगी की रफ़्तार में बहुत सारे सवाल शायद पीछे रह जाते हैं. रोजमर्रा की जिंदगी में, लोगों के पास इतना समय नहीं कि वे और बातों को ध्यान में रख पायें. मुंबई एअरपोर्ट से निकलने के तुरंत बाद यह लगने लगता है कि मुंबई की सडकें अभी भी अपने हुक्मरानों से आस लगाये बैठी है. सड़कों का बुरा हाल है. यह शहर या तो आसमान की तरफ देख रहा है या फिर समुन्दर की ओर, गगन-चुम्बी इमारतें आपको वैसे भी जमीन पर देखने कहाँ देती हैं. पैसों का शहर है लेकिन जिस इलाके में अमीर हैं वहां की सड़क से लेकर तमाम सुविधाएँ भी अच्छी हैं. खैर! इतने सालों में तो इस देश के लोगों को पता चल हीं गया है की इस देश में सरकार किसकी होती है. मलाड के एक ढाबे वाले ने पूछने पर बताया कि शहर में जातिवाद नहीं है, वो सब गाँव में है. गाँव वालों को पिछड़ेपण का शिकार भी बता दिया. ऐसा लग रह था मानों आधुनिक समाज, ऐसी सोच-विचार कितना जरुरी था, यह कह रहा हो कि उनसे पहले का समाज बहुत हीं क्रूर और निर्दयी और अत्याचारी था जबकि सच यह है कि आधुनिक समाज ने तो दो विश्व युद्ध किये, एटम बम गिराया, अनगिनत लोग मारे. करोड़ों लोगों की मृत्यु तो आधुनिक समाज में सिर्फ भूख से हो गयी. गाँव की अपनी समस्यायें हैं लेकिन शहर उन समस्याओं से निजात नहीं पा सका है जिस वजह से गाँव को हेय दृष्टि से देखता है.

होटल में काम करने वाली महिला ११ मंजिल वाली बिल्डिंग की साफ़ सफाई पूरे महीने महज पांच हजार रूपये में करती हैं. अब यह गाँव से बहुत अलग कैसे हैं? वहां बंधुआ मजदूरी के तहत ऐसे होता था. बस किसी तरह पेट भरता था. गाँव के ऊँची जाति के लोग जो आमिर भी थे, उन्हें इंसान तक नहीं समझते थे और यहाँ शहर में भी उन्हें इंसान वाली केटेगरी से दूर हीं रखा है. एक ऑटो रिक्शा वाला रोज चिकन खाता है क्योंकि हरी सब्जियां मंहगी होने के साथ-साथ बनने में समय भी ज्यादा लेती है. गाँव होता तो खेत से कुछ साग हीं तोड़ लाते, अब मुंबई में ये सब कहाँ.

जुहू बीच भारत के सबसे दूषित बीच में से एक होता जा रहा है, कोई साफ़ सफाई नहीं लेकिन सैलानी की ठसम-ठस यह दर्शाता है कि समन्दर में उठने वाले हर वेव में लोग अपने जिंदगी के उतार-चढ़ाव की देखते हैं.

मरीन ड्राइव रात में दिन जैसा होता है. लोग वहां बैठकर एक तरफ की गगन-चुम्बी इमारतें देखते हैं या फिर समंदर को निहारते रहते हैं. समन्दर की लहरों का हर बार चट्टान से टकराना शायद लोगों को लड़ने की प्रेरणा देता हो.

Deepak Bhaskar

Feb 17 2017

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