कोई राष्ट्रपिता ऐसे हीं नहीं बन जाता है.
हमारे प्रधानमंत्री के विभिन्न फोटो को लेकर काफी विवाद होता रहता है. चाहे वह रिलायंस जिओ और पेटीएम के पोस्टर मैन बनने की वजह से हो या फिर खादी ग्रामोद्योग मंत्रालय द्वारा जारी कलेंडर में चरखा चलाते हुए मोदी जी का फोटो हो. जैसे हीं यह कैलेंडर जारी हुआ, सोशल मीडिया से लेकर मेनस्ट्रीम मीडिया तक बवाल मच गया. इतनी हाय-तौबा मची जैसे लगा प्रधानमंत्री ‘राष्ट्रपिता’ गाँधी को विस्थापित कर खुद को, इस उपाधि से खुद हीं नवाजेंगे. महात्मा गाँधी के खिलाफ आये दिन अट-पट बयान नेतागण देते रहते हैं, कई बार ऐसा लगता है कि गाँधी से ज्यादा क्रिटिकल अनालिसिस शायद हीं किसी विद्वान का हुआ हो. गाँधी को हटाने के प्रयास के क्रम में हिन्दू महासभा के सदस्य नाथूराम गोडसे ने इनकी हत्या कर दी थी. लेकिन हत्या करने वाले को शायद इस बात का अंदाजा नहीं था कि गाँधी की हत्या से गाँधी नहीं मरेंगे. वैसे भी गाँधी व्यक्ति नहीं, बल्कि विचार है और विचार गोली से नहीं मरते.
बहरहाल, आजकल गाँधी का राष्ट्रपिता होना भी कुछ लोगों को रास नहीं आ रहा है. आये दिन इनको हटाकर, नए आदर्श स्थापित करने कि असफल कोशिश लोग करते रहते हैं. उन्हें यह समझना चाहिए कि कोई राष्ट्रपिता गाँधी ऐसे नहीं बन जाता है. गाँधी बनने के लिए सारी सुख-सुविधाओं को छोड़कर, लोगों के साथ आना पड़ता है. जब वो देश, जिसे आजादी इतनी कुर्बानियों के बाद मिला हो और उसका जश्न लाल किले पर मनाया जा रहा हो, तब आजादी की लड़ाई के नायक गाँधी जश्न को छोड़कर, लोगों के पीड़ा के साथ नोआखोली(बंगाल) में रह रहा होता है. अपने सत्य-विचार को लेकर अडिग रहना हीं “गाँधी” की परिभाषा है. देश की संकल्पना को महज जमीन का टुकड़ा भर नहीं बल्कि लोगों का समूह के तौर पर मानना पड़ता है. गाँधी जी ने आजाद हुए राष्ट्र, को सत्य-अहिंसा जैसे विचार के रास्ते पर पर लेकर चला. उसने इस राष्ट्र का नाम नहीं बदला बल्कि इसका दृष्टिकोण बदला. इस राष्ट्र को आगे बढ़ने के लिए मानवीय संवेदना की समझ का मूल मन्त्र दिया. गाँधी टूटते समाज की वो कड़ी बने जिसके कारण, यह राष्ट्र आज भी ऐ एल बाशम की किताब ‘वंडर्स दैट वाज इंडिया’ की तरह दुनिया के लिए रिसर्च का विषय बना हुआ है. दुनिया के लिए यह आश्चर्य का विषय है कि, इतनी विविधता वाला राष्ट्र बिना खंडित हुए आगे बढ़ रहा है, जबकि सत्य यह है कि दुनिया के कई देश विविधताओं के कारण खंड-खंड में बाँट दिए गए हैं. यह भी समझना जरुरी है कि जब आजाद भारत के संविधान बनाने की बारी आई तो गाँधी ने बाबा साहेब आंबेडकर को यह उत्तरदायित्व सौंपा. गाँधी जानते थे कि बराबरी, स्वतंत्रता, न्याय एवं भाईचारे जैसे सिद्धांत को इस देश का, सबसे जयादा उत्पीड़ित समाज ही समझेगा. आज भारत का संविधान, दुनिया के किसी भी संविधान से बेहतर शायद इसीलिए हो जाता है क्योंकि ये बाबा साहेब आंबेडकर जैसे पीड़ित व्यक्ति ने लिखा है. गाँधी को हम राष्ट्रपिता नहीं भी माने तब भी इतिहास उन्हें राष्ट्रपिता हीं मानेगा.
अब पंडित नेहरु को नवीन भारत का जनक कहा हीं जायेगा, हजार तरह के विवाद हो सकते हैं. लेकिन नेहरु ने भाखरा-नांगल जैसे बहुउद्देशीय योजना को आधुनिक भारत का मंदिर-मस्जिद या गिरजाघर कहा. राष्ट्र को आधुनिक बनने के लिए ऐसी सोच-विचार का होना जरुरी था. जब पूरी दुनिया दो ध्रुवों अमेरिका और सोवियत संघ में बंटा हुआ था, उस दौर में भारत के लिए इन नाम की नीति को अपनाकर आगे बढ़ना अत्यंत आवश्यक था. भारत जैसे नव-स्वतंत्र राष्ट् को वैश्विक मंच पर अपनी पहचान बनाने के लिए ये सब जरुरी कदम थे.
श्री राजीव गाँधी को भारत के सुचना एवं प्रोद्योगिकी के जनक के तौर पर जाना जाता है. इस बात किसको इनकार हो सकता है कि राजीव गाँधी ने इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाये और इसके लिए नीतियाँ बनाई. प्रधानमंत्री वी पी सिंह से लेकर मनमोहन सिंह तक ने बहुत सारी नीतियाँ बनायीं हैं. परन्तु, कई विद्वानों का मानना है कि मोदी जी “डिजिटल इंडिया” के जनक बनना चाहते हैं. इसमें कोई बुराई भी नहीं, कोई क्या बनना चाहता हैं. लेकिन क्या चरखा पर बैठकर फोटो निकलवाने भर से देश में खादी का प्रचलन हो जायेगा. मोदी जी के फोलोवर हैं तो आज वो शायद खादी पहन भी लें लेकिन मोदी जी हमेशा तो नहीं रहेंगे, फिर ये फोलोवर किसी और को फॉलो करेंगे. खादी एक विचार है, खादी एक सोच है, खादी पर विशेष विश्लेषण जेएनयु की रिसर्च स्कॉलर एकता जैन ने किया है, उसे पढना चाहिए. आजकल ज्यादा नाम बदलकर नया नाम रखने की प्रथा जैसी चल पडी है. रोड नहीं बनाये जा रहे बल्कि सडको के नाम बदले जा रहे हैं. योजना आयोग का नाम बदलकर निति आयोग रख दिया गया लेकिन उससे क्या बदल गया, कुछ भी तो नहीं. निर्मल भारत का नाम स्वच्छ भारत रख दिया गया. जरुरत थी इस बात को सोचने की, निर्मल भारत किस चीज की कमी रह गयी थी. कूड़ेदान तब भी नहीं थे वो आज भी नहीं है.
बहरहाल ये समझना जरुरी है कि राष्ट्रपिता या जनक नाम बदलने या फिर उपरी सतह पर काम करने से नहीं बनते बल्कि उसके लिए जनता के जीवन में मूलभूत परिवर्तन, उनके सोच में आधुनिकता लाना जरुरी होता है. आप राष्ट्रपिता को बदलना चाहते हैं तो बदल दीजिये परन्तु ये बात तो तय है कि गाँधी कोई ऐसे हीं नहीं बन जाता है.
Deepak Bhaskar
Feb 17 2017
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